राजनीति में अक्सर नेता बड़े-बड़े काफिलों और महंगी गाड़ियों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आज एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा हर ओर हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को जमीन पर उतारते हुए मुख्यमंत्री आज अपने आवास से पैदल ही सचिवालय पहुँचे। जब देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं, तब बिहार के मुखिया का यह पैदल मार्च आम आदमी के लिए एक बड़ी सीख है। आखिर सम्राट चौधरी की इस ‘ईंधन बचाओ‘ मुहिम के पीछे का क्या है पूरा मास्टरप्लान?
शुक्रवार की सुबह पटना की सड़कों पर एक अलग ही नजारा था। गाड़ियों के सायरन और लंबे काफिले की जगह बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पैदल चलते नजर आए। लोक सेवक आवास से सचिवालय तक की यह दूरी भले ही कम हो, लेकिन इसका संदेश बहुत बड़ा है। मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि पेट्रोल-डीजल की खपत कम करना अब समय की मांग है। उन्होंने जनप्रतिनिधियों और आम लोगों से अपील की है कि वे सार्वजनिक परिवहन यानी बस, ऑटो और रिक्शा का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें।
मुख्यमंत्री ने केवल पैदल चलकर ही नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों से भी इस मुहिम को मजबूत किया है। अब मुख्यमंत्री के काफिले में गाड़ियों की संख्या कम कर दी गई है। इसके अलावा, सरकारी विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि बैठकें अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हों ताकि यात्रा का खर्च और ईंधन दोनों बच सकें। सम्राट चौधरी ने एक और साहसी सलाह दी है—सरकारी और निजी दफ्तरों में ‘वर्क फ्रॉम होम‘ और सप्ताह में एक दिन ‘नो व्हीकल डे‘ मनाने का आह्वान। इतना ही नहीं, सरकारी कैंटीनों में पाम ऑयल के कम उपयोग का निर्देश देकर उन्होंने स्वास्थ्य और बचत दोनों का ध्यान रखा है।
सम्राट चौधरी की यह पहल ऐसे वक्त में आई है जब तेल की कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। केंद्र सरकार द्वारा शुक्रवार को पेट्रोल-डीजल के दामों में 3-3 रुपये की बढ़ोतरी के बाद राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 97.77 रुपये और मुंबई में 106.68 रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गया है। कोलकाता और चेन्नई में भी स्थिति वैसी ही है। कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल के बीच आम जनता महंगाई के बोझ तले दबी है। ऐसे में बिहार सरकार के ये कदम फिजूलखर्ची रोकने के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट‘ साबित हो सकते हैं।
सम्राट चौधरी की इस पहल ने साबित कर दिया है कि परिवर्तन की शुरुआत खुद से होनी चाहिए। अगर बिहार के मंत्री और अधिकारी इस ‘नो व्हीकल डे‘ और ‘छोटे काफिले‘ की संस्कृति को अपनाते हैं, तो यह सरकारी खजाने के लिए एक बड़ी राहत होगी। अब देखना ये है कि आम जनता और अन्य राज्य इस पहल को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

