आमिर खान की गौरी स्प्रैट से तीसरी शादी सिर्फ एक एजेंडा!

आमिर खान सार्वजनिक रूप से तीसरा विवाह कर लिए हैं। इस्लाम में स्त्री भोग की वस्तु है अन्यथा पत्नियां तो पहले से थी ही। एक निश्चित एजेंडे के तहत कुछ दिनों में चौथे की तैयारी करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। साथ ही साथ में उन भारतीय नारियों को बधाई देना चाहता हूं जो आमिर खान के परिवार को बढ़ाने में भरपूर सहयोग कर रही हैं, संभवतः कुछ आगे भी करती रहेंगी।

गौर करने लायक बात यह है कि उन्होंने एक भी मुस्लिम महिला से विवाह नहीं किया परंतु उत्पादन एक ही प्रकार का हुआ। ऐसा नहीं होगा कि उनके माया जाल में मुस्लिम लड़कियां न फंसी हो परंतु आमिर खान मुस्लिम है समय-समय पर निश्चित रूप से मौलवियों से तालीम, मशविरा लेते रहते होंगे। उन्हें पता है मुस्लिम समाज में तलाक बोलने का अधिकार महिला को भी है। उनकी इस अय्याशी को वे बख़ूब समझती है और तीन तलाक बोलकर मैहर में अच्छी खासी जायदाद, रकम का दावा कर सकती है। आमिर के सरपरस्त मौला भी ऐसे में आमिर खान को नहीं बचा सकते।

आमिर को हिंदू संस्कृति तथा हिन्दू महिलाओं के संस्कारों की भी जानकारी है। वे जानते हैं कि हिंदू महिला जिसको एक बार पति रूप में स्वीकार करती है सात जन्म तक उसे पति रूप में मानती है। इसी कारण उनकी दोनों पत्नियां भी उनके तीसरे विवाह समारोह में सम्मिलित थी। अब यह उनकी विवाह से पूर्व मिले पारिवारिक संस्कारों का प्रतिफल था या मजबूरी यह तो वही जाने।

आमिर खान यह सब क्यों कर रहे हैं दो पत्नियों तथा कई बच्चों के होते हुए क्या आयु के तीसरे चरण में भी तीसरे विवाह की आवश्यकता थी? इन सब प्रश्नों से आमिर खान का कोई सरोकार नहीं। उन्हें इस्लामिक शिक्षा के अनुसार जन्नत में जाना है इसलिए शादी खाना-ए-आबादी तथा सहमति से ही सही अप्रत्यक्ष रूप से लव जिहाद ही कर रहे हैं, अन्यथा रोमांस, फ्लर्ट की तो सुविधा फिल्मी हीरो को अपरिमित रहती है।

दारुल इस्लाम का जिक्र कुरान या हदीस में नहीं है। परंतु 1000 वर्षों से यह इस्लामिक मानसिकता प्रवाहमान है। येन केन प्रकारेण सभी को इस्लामी सत्ता के अंतर्गत लाना लक्ष्य है। उस मानसिक जिहाद के अनगिनत रूप सामने आ रहे हैं। विडंबना यह है कि इस विक्षिप्त मानसिकता को अनेक इस्लामी विद्वान जानते हैं। मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा तबका भी इससे वाकिफ है परंतु मुखर रूप से विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। समय समय पर कुछ विद्वान आलिम इसका विरोध करते भी हैं परंतु वे शेष मुस्लिम समाज द्वारा एक प्रकार से बहिष्कृत कर दिए जाते हैं। इसी आशंका, डर, भय से पढ़ा लिखा मुस्लिम समाज भी जाहिलियत, बेहूदगी, अमानवीयता का खुलकर विरोध नहीं कर पाता।

इस प्रकार की समस्याओं का समाधान केवल लोक जागरण द्वारा ही संभव है। लोक चेतना जागृत होगी तो व्यापारी जमात को भी तब सद्बुद्धि आएगी, जब उपभोक्ताओं द्वारा ऐसे लोगों के द्वारा विज्ञापन की गई वस्तुओं का बहिष्कार होगा। कंपनियां ऐसे लोगों को विज्ञापन में करोड़ों रुपया देती है और विज्ञापन करोड़ों लोगों का समय व्यर्थ करता है। नासमझ दर्शक बेहूदा उछल कूद वाली फिल्मों को देखकर अपनी मेहनत की कमाई से फरेबी लोगों की जेबें भर उन्हें ऐश फरमाने की सुविधा देता है और समय समय पर ठगा जाता है।

अंत में याद दिला दूं ये वही आमिर खान हैं जिन्हें भारत में अपना परिवार असुरक्षित लगता है। चुनावों के समय इस प्रकार के बयान एक प्रच्छन्न एजेंडे के तहत ही दिए जाते हैं। आमिर यदि सच में बेहद खूबसूरत, बुद्धिमान, नेकदिल प्रिंस होते तो फिर युवा से प्रौढ़ा अवस्था तक किसी अरब देश की कैसी भी औरत का दिल इनके लिए क्यों न कुलबुलाया?
सच में देश का आम जन बहुत भोला, निष्कपट, सरल हृदय है। यह बात ठग, फरेबी, लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं। महिलाएं उनके लिए सॉफ्ट टारगेट होती हैं।

 

लेखक- संजय स्वामी (लेखक, चिंतक, स्तंभकार)

 

Advertise with us