दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला मैदान इस समय एक ऐसे महा-संगम का गवाह बना है जिसे आने वाले कई सालों तक याद रखा जाएगा। मौका था भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम‘ का। देश के कोने-कोने से आए करीब डेढ़ लाख आदिवासियों के इस जनसमुद्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसे ‘जनजातियों का महाकुंभ‘ करार दिया है।
अमित शाह ने जहां एक तरफ जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए प्रकृति पूजा को सनातन संस्कृति का मूल आधार बताया, वहीं दूसरी तरफ यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को लेकर आदिवासी समाज को पूरी तरह आश्वस्त किया। लेकिन इस मंच से सिर्फ संस्कृति की बात नहीं हुई, बल्कि आदिवासियों में तेजी से बढ़ रहे धर्मांतरण को लेकर भी देश के बड़े नेताओं ने इसे ‘कैंसर‘ बताते हुए आरक्षण खत्म करने तक की बड़ी मांग उठा दी है।
लाल किला मैदान में चारों तरफ बिखरे पारंपरिक रंग और ढोल-नगाड़ों की थाप इस बात का सबूत थी कि यह आयोजन कितना भव्य है। समागम को संबोधित करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि भले ही उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा को नहीं देखा, लेकिन आज यहां उपस्थित लाखों आदिवासियों में उनकी छवि साफ दिखाई दे रही है।
इसी मंच से गृहमंत्री ने आदिवासी समाज को समान नागरिक संहिता को लेकर सबसे बड़ा भरोसा दिया। शाह ने साफ शब्दों में कहा कि यूसीसी कानून आदिवासियों को प्रभावित करने के उद्देश्य से बिल्कुल नहीं बना है, इसलिए समाज पूरी तरह आश्वस्त रहे। उन्होंने याद दिलाया कि देश में आदिवासियों के कल्याण का असली काम बीजेपी सरकार के आने के बाद शुरू हुआ, जब आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पहली बार अलग से जनजाति कल्याण मंत्रालय की स्थापना की थी।
संस्कृति और विकास की चर्चा के बीच, इस महाकुंभ में आदिवासियों की सुरक्षा और उनके अस्तित्व से जुड़ा एक बेहद गंभीर मुद्दा भी उठा। जनजातीय सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत ने बड़ी बेबाकी से कहा कि जनजातियों में धर्मांतरण (Conversion) का प्रभाव काफी तेजी से बढ़ रहा है, जो हमारे समाज के लिए ‘कैंसर‘ की तरह है। वहीं, राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राज किशोर हांसदा ने साफ कर दिया कि धर्मपरिवर्तन कभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि अगर धर्म बदला तो हमारी संस्कृति हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।
वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने भी बिरसा मुंडा को समस्त जनजातियों का भगवान रूपी आदर्श पुरुष बताते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा धर्मांतरण को रोकने और अपनी जमीन को बचाने के लिए संघर्ष किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि आदिवासी समाज हमेशा सरकार के साथ सहयोग की भूमिका में रहा है और आगे भी रहेगा।
यह ऐतिहासिक समागम सिर्फ लाल किला मैदान तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी गूंज पूरी दिल्ली में सुनाई दी। दिल्ली के अलग-अलग कोनों—जैसे राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कश्मीरी गेट और शास्त्री पार्क से भव्य शोभायात्राएं निकालते हुए लाखों आदिवासी लाल किला ग्राउंड पहुँचे।
भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर दिल्ली में हुआ यह जनजाति समागम सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह आदिवासियों के अस्तित्व, अस्मिता और उनकी संस्कृति को बचाने वाले एक नए आंदोलन की शुरुआत है। गृहमंत्री के भरोसे और मंच से उठी मांगों के बाद अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में देश की राजनीति इस पर क्या रुख अपनाती है।

