आधुनिक भारत के निर्माण में मदन मोहन मालवीय का योगदान : लेखक : डा. मोहम्मद अलीम

डा. मोहम्मद अलीम

डा. मोहम्मद अलीम

ऐसा प्रायः देखा गया है कि जब-जब दुनिया में विषम परिस्थितियां पैदा हुई हैं, ऐसे में धरती पर युग पुरूषों का जन्म हुआ है। पंडित मदनमोहन मालवीय एक ऐसे ही इंसान थे जिन्हें आगे चल कर महामना की उपाधि से विभूषित किया गया। आपको मरणोपरांत भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। उनका जन्म भारत के एक साधारण परिवार में 1857 के गदर के साढे़ चार वर्ष बाद 25 दिसबंर 1861 को ज्ञान एवं विद्या के लिए प्रसिद्ध नगरी प्रयाग में हुआ था। उनके पितामह प्रेमधर जी संस्कृत के बड़े विद्वान थे। उनके पिता पंडित ब्रजनाथजी एवं माता श्रीमती मूना देवी ने सात लड़कों को जन्म दिया जिनमें मदमोहन मालवीय सबसे अधिक प्रतिभाशाली सिद्ध हुए। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हरदेवजी महाराज की धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई। वहां उन्होंने संस्कृत भाषा एवं प्राचीन शास्त्र का ज्ञान अर्जित किया। देश भक्ति और धार्मिक कार्यों के प्रति उनमें बचपन से ही एक गहरा लगाव पैदा हो गया था। सन् 1868 में उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए गवर्नमेंट हाइस्कूल, प्रयाग में प्रवेश लिया और उसके बाद म्योर सेंट्रल कालेज में पढ़ाई करने लगे। 1884 में बी.ए की परीक्षा पास करने के बाद गवर्नमेंट हाइस्कूल जहां उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी, उन्हें अध्यापन करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। 1891 में वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद अदालत में प्रेक्टिस शुरू कर दी। और बहुत जल्दी ही उनका नाम अपने समय के दूसरे प्रसिद्ध वकीलों के साथ शुमार किया जाने लगा। वह कहा करते थे, ‘‘ जब फौज हो कमज़ोर तो अख़बार निकालो।’’ इसी उक्ति से प्रेरित हो कर महामना ने प्रसिद्ध पत्र ‘‘मर्यादा’’, ‘‘ हिंदी प्रदीप ’’ और अंग्रेजी में ‘‘ इंडियन यूनियन ’’ का प्रकाशन आरंभ किया। 1887 में उन्हें ‘‘ हिंदोस्थान’’ नाम पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी दी गई जिसे उन्होंने पूरी कामयाबी के साथ पूरा किया। सन् 1909 में उनकी देख-रेख में अंग्रेज़ी दैनिक ‘‘लीडर’’ का प्रकाशन आरंभ हुआ।

रचनात्मक और राजनीतिक कार्यों के साथ-साथ वह वकालत का काम भी करते रहे और साथ ही राष्ट्रसेवा में भी लीन रहे। जब उन्हें लगा कि स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में अधिक समय देने की आवश्यकता है तो फिर 1913 तक आते-आते उन्होंने वकालत का काम बिल्कुल ही छोड़ दिया। इस दशक में उनका एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य अदालतों में देवनागरी लिपि के प्रयोग को सरकार के द्वारा स्वीकृत कराना था। मालवीय जी की राजनीतिक सक्रियता हमेशा कांग्रेस पार्टी के मंच से बनी रही। 1909, 1918, 1930 एवं 1932 में उन्होंने कांग्रेस की अध्यक्षता की। स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के कारण कई बार वह जेल भी गए और यातनाएं बर्दाश्त कीं। पर अपने शैक्षणिक एवं सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाने हेतु 1937 में मालवीय जी ने सक्रिय राजनीतिक जीवन से संयास लेने का फै़सला किया जो बहुत फलदायक सिद्ध हुआ।

वह हिंदी भाषा एवं साहित्य की प्रगति के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते। उनका कहना था कि देश की सभी भाषाएं उन्नति के पथ पर आगे बढ़ें, हिंदी जानने वाले हिंदी की उन्नति करें और उर्दू जानने वाले उर्दू की। वह दोनों भाषाओं के साझा सहयोग के बड़े हिमायती थे। वह इस बात को भी बड़ी शिद्दत से महसूस करते थे कि देश को अगर अज्ञानता एवं दासता की जंजीरों से छुटकारा हासिल करना है तो उसे ज्ञान के पथ पर पूरी शक्ति एवं उर्जा के साथ आगे बढ़ना होगा।

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वह कहा करते थे कि देश के लोग जिस गरीबी में फंसे हुए हैं उससे छुटकारा तभी मिल सकता है जब विज्ञान का उपयोग उनके हित में किया जाए। इस प्रकार के उपयोगी, सैद्धांतिक और व्यावहारिक विज्ञान का आधिकारिक प्रयोग तभी संभव हो सकेगा जब इसे भारतीय अपने ही देश में प्राप्त करें। विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वविद्यालय उनकी इसी सोच का परिणाम है। 1916 में विश्वविद्यालय के शिलान्यास के लिए उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को आमंत्रित किया। साथ ही प्रांतीय गर्वनरों, राजा महाराजों, ज़मींदारों, शिक्षा शास्त्रियों और राष्ट्र नेताओं को भी शामिल होने का निमंत्रण भेजा। 1919 से 1939 तक वह वह इस विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।

वह इस विश्वविद्यालय को प्राचीन एवं आधुनिक विचारों का एक अनूठा केंद्र बनाना चाहते थे और उन्हें अपने इस मकसद में कामयाबी भी मिली। वह चाहते थे कि इस विश्वविद्यालय से जहां एक ओर तक्नीकी ज्ञान अर्जित करने वाले इंजीनियर, डाक्टर, वैज्ञानिक पैदा हों, वहीं उच्च कोटि के साहित्यकार, विचारक , दार्शनिक, समाज शास्त्री एवं इतिहासकार भी सामने आएं। धार्मिक शिक्षा पर भी उनका विशेष बल रहता था। उनका मानना था कि इसका लक्ष्य प्राणी मात्र का कल्यान होना चाहिए। चाहे वह शिक्षा हिंदुओं को दी जाए या मुसलमानों को। मालवीय जी स्त्री शिक्षा के भी प्रबल पक्षधर थे। उनके विचार से स्त्री शिक्षा पुरूषों से अधिक जरूरी है क्योंकि वह पीढ़ियों का निर्माण करती है।

वह यह भी चाहते थे कि विद्यालयों में संगीत, काव्य, नाट्यकला, चित्रकला, वास्तुकला तथा मूर्तिकला आदि ललित कलाओं की शिक्षा का भी प्रबंध हो और उनमें से कम से कम एक कला में विद्यार्थी अवश्य ही दिलचस्पी लें। उनके विचार में कलाविहीन जीवन शुष्क और नीरस होता है। उनका महान व्यक्तित्व आज भी हमारे लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है बर्शते कि उनकी शिक्षाओं का ईमानदारी से पालन किया जाए।
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डा. मोहम्मद अलीम संस्कृति पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार, नाटककार, पटकथा लेखक एवं पत्रकार हैं।
अभी हाल ही में वाल्मीकि रामायण पर आधारित में एक नाटक की रचना की है जिसका नाम है ‘‘इमाम-
ए-हिंद : राम ’’। बहुत जल्दी ही इसका प्रकाशन एवं मंचन होने जा रहा है।

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