ध्येय पथ पर बढ़ती राष्ट्र सेविका समिति- स्थापना दिवस विशेष

डॉ. सुनीता शर्मा (लेखिका व शिक्षाविद्)

प्रत्येक राष्ट्र जो उन्नति चाहता है दिनों- दिन प्रगति के मार्ग पर बढ़ना चाहता है उसके लिए आवश्यक है कि वह अपनी समृद्धशाली संस्कृति और इतिहास को कभी ना भूले क्योंकि भूतकालीन कृतियां व घटनाएं ही भविष्य की पथ प्रदर्शक होती हैं। हम अपनी नींव, अपनी संस्कृति पर अडिग रहकर वर्तमान और भविष्य की ओर कदम बढ़ाए तो देश और समाज का निर्माण संभव है इसी महान विचार को लेकर राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हुई।
राष्ट्र सेविका समिति पूरे विश्व में महिलाओं का सबसे बड़ा और सुदृढ़ महिला संगठन है। देश को आजाद हुए आज 77 वर्ष हो गए हैं। देश की स्वतंत्रता से भी 10 वर्ष पूर्व राष्ट्र सेविका समिति का कार्य प्रारंभ हुआ । 87 वर्षीय राष्ट्र सेविका समिति आज एक विशाल वट वृक्ष का रूप ले चुकी है जिसकी शाखाएं देश के प्रत्येक प्रांत, जिले, कस्बे तक फैली हुई हैं तथा विश्व के सुदूर देशों में भी समिति का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। समिति का उद्देश्य केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था अपितु देश के निर्माण और स्वतंत्रता में तन-मन-धन से योगदान देना था। राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना से पूर्व देश में इस प्रकार का कोई भी महिलाओं का अखिल भारतीय संगठन कार्य नहीं कर रहा था । किसी भी संगठन का कार्य व्यापक होता है और संस्था मर्यादित होती है। राष्ट्र सेविका समिति का जन्म राष्ट्र के विचार से हुआ था। राष्ट्र का चंहुमुखी विकास करना ही इसका उद्देश्य है। दायित्व हमेशा अपने अधिकारों के विचार से नहीं अपने कर्तव्यों के विचार से उठाया जाता है। समिति में सेविकाओं ने स्वयं दायित्व स्वीकार किया है, किसी के कहने या ज़ोर जबरदस्ती से नहीं। राष्ट्र सेविका समिति की संकल्पना का भी विचार यही था कि स्त्री भी पुरुषों के समान राष्ट्रहित में कार्य करें। राष्ट्र स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर बनता है और महिलाएं संख्या में पुरुषों के समान हैं। मानव जीवन में भी स्त्री और पुरुष की पूर्णता से ही परिवार और समाज संगठित व मजबूत होते हैं। भगिनी निवेदिता ने कहा था कि हम महिलाओं से भी राष्ट्र है। राष्ट्र की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। राष्ट्र सेवा यह एक व्रत है और व्रत जीवन में एक बार ही लिया जाता है । समिति सेविकाओं ने अपनी आंखें खोलकर इस व्रत को आजीवन करने का संकल्प लिया है। जब मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है तब वह व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना से ऊपर उठ जाता है। समिति की सेविकाएं भी राष्ट्रभाव लिए देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर हैं। देश की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ऐसे संगठनों की आवश्यकता होती है जो मानव जाति को संगठित कर सकें। इसी बात को ध्यान में रखते हुए राष्ट्र सेविका समिति संगठन की स्थापना हुई जो महिलाओं में सामाजिक, सांस्कृतिक चेतना जागृत कर समाज हित में कार्य कर सके ।

राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका और प्रथम संचालिका लक्ष्मी बाई केलकर इस बात से भली भांति परिचित थी कि केवल समाज की अर्ध शक्ति पुरुष ही देश को स्वतंत्रता नहीं दिलवा सकते हैं। उनके अनुसार अर्धशक्ति से राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता है इसलिए डॉक्टर हेडगेवार जी के समक्ष जब लक्ष्मीबाई केलकर जी ने यह प्रश्न रखा कि आप के संगठन में केवल पुरुष ही हैं और ऐसी स्थिति में राष्ट्र का निर्माण नहीं होगा क्योंकि आपके पास केवल अर्ध शक्ति है। हेडगेवार जी ने कहा कि अगर आप महिलाओं को जागृत करना चाहती हैं तो स्वयं से ही महिलाओं के लिए संगठन की स्थापना करें। डॉक्टर हेडगेवार के मार्गदर्शन से उन्होंने संगठन की स्थापना की और इस प्रकार राष्ट्र सेविका समिति संगठन की नींव पड़ी । इस संगठन की विचारधारा पुरुषों के संगठन के समान किंतु समानांतर है और यह एक स्वतंत्र संगठन है। डॉक्टर हेडगेवार व
महात्मा गांधी के आदर्शों का भी लक्ष्मीबाई केलकर पर बहुत प्रभाव रहा। उन्होंने रामायण के महत्व को समझ कर बाद में स्थान- स्थान पर माता सीता के चरित्र व रामायण पर व्याख्यान दिए। देश के विभाजन के समय पर सेविकाओं के आह्वान पर लक्ष्मीबाई केलकर कराची पहुंची और सेविकाओं को विषम परिस्थितियों का साहस के साथ सामना करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महिलाओं के जागरण के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया ।

संस्थापिका लक्ष्मीबाई केलकर जी ने अपने वैधव्य को अभिशाप न मानकर शक्ति माना और राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुट गईं तथा वर्धा में विजयदशमी के दिन 1936 में समिति की स्थापना की। वंदनीय लक्ष्मी बाई जी का संपूर्ण जीवन अनुकरणीय रहा है। समिति की स्थापना करने के पश्चात यह विचार भी रहा की बहनों को ऐसा क्या सिखाया जाए जिससे कि वह राष्ट्र धर्म के कार्य में जुटें इसलिए दिन प्रतिदिन समिति के लिए योजनाएं बनने लगी। महिलाओं को प्रतिदिन निश्चित समय पर मिलने का आयोजन किया गया ताकि महिलाएं सुशीला ,सुधीरा, समर्था बनें तथा उनके हृदय में हिंदुत्व का भाव जगे इसलिए महिलाओं को सैनिक पद्धति के अनुसार शाखा का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। समिति की बहनों के स्वास्थ्य का महत्व समझते हुए “स्त्री जीवन विकास परिषद’ का 1953 में आयोजन किया गया तथा डॉक्टर्स को एकत्र का परिचर्चा भी आयोजित की गई । योगासन स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होगा इस विचार को करते हुए समिति शिक्षा वर्ग में योगासन का समावेश किया गया है । एक आदर्श सेविका कैसी हो? इस बात पर भी लगातार चिंतन -मनन कर स्पष्ट रूपरेखा तैयार की गई। समिति शाखा स्थान पर अनुशासित होकर व्यायाम, योग, दंड ,छुरिका, नियुद्ध आदि की शिक्षा दी जाने लगी । खेलों का समावेश भी राष्ट्र सेविका समिति की शाखाओं में किया जाने लगा क्योंकि खेलों के माध्यम से बहनों से आध्यात्मिक मन, शौर्य ,साहस धैर्य ,देशभक्ति का निर्माण होगा। सुदृढ शरीर में तेजस्वी मन का निर्माण होता है इसलिए बौद्धिक विकास के विभिन्न कार्यक्रम भी शाखाओं में करवाए जाते हैं ताकि समिति की सेविकाओं में भारतीय संस्कृति, इतिहास ,धर्म और अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त हो सके।

आज अगर संसद से सड़क तक में मातृशक्ति की गूंज है तो उसमें भी कहीं ना कहीं लक्ष्मीबाई केलकर के विचारों को ही प्रधानता मिली है कि उन्होंने 1936 में जिस मातृशक्ति के विषय में सोचा था आज संसद भवन में भी उस मातृशक्ति की उपस्थिति प्रत्येक भारतीय के मन में प्रेरणा का संचार करती है। भारतीय महिलाओं के समक्ष माता सीता, मदालसा ,गार्गी, मैत्री, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होलकर, माता जीजाबाई , पद्मावती, विद्यावती (भगत सिंह की माता जी) आदि कई महिलाओं का उदाहरण है कि महिला शक्ति अगर कुछ मन में ठान ले तो कुछ भी असंभव नहीं है।


राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका और आद्य प्रमुख संचालिका श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर ने महिलाओं में छुपी शक्तियों को उस समय पहचाना जब नारी सशक्तिकरण की बात से कोई परिचित भी नहीं था । 25 अक्टूबर 1936 विजयदशमी के दिन महिलाओं के एक ऐसे संगठन की नींव रखी गई जो व्यक्ति निर्माण के साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी योगदान दे ।आद्य संस्थापिका व प्रमुख संचालिका लक्ष्मीबाई केलकर जी की मृत्यु पश्चात 1978 में समिति की बागडोर सरस्वती ताई आप्टे ने संभाली। वर्ष 1994 में उषा ताई चाटी ने तृतीय प्रमुख संचालिका का दायित्व संभाला । चतुर्थ प्रमुख संचालिका माननीय प्रमिल ताई रहीं और वर्तमान में माननीय शांता अक्का जी समिति की प्रमुख संचालिका हैं। इन सभी प्रातः स्मरणीय प्रमुख संचालिकाओं के नेतृत्व में समिति का कार्य देश और विश्व के कई देशों में पहुंचा है । आज देशभर में लगभग 3 लाख समिति की सेविकाएं राष्ट्रभाव लिए समिति कार्य के लिए कृत संकल्पित हैं।
भारत के 2380 शहरों ,कस्बों और गांवों में समिति की 3000 शाखाएं चल रही हैं। समिति के 1000 सेवा प्रकल्प चल रहे हैं। दुनिया के 16 देशों में समिति की सशक्त उपस्थिति दर्ज हो चुकी है।

सेविका समिति सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक धरातल पर 1936 से काम कर रही है ।शाखाओं के माध्यम से समिति की सेविकाएं (सदस्या) समाज और देश के समग्र विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अगर हम देखें तो देश में राष्ट्रीयता व एकता के भाव के प्रचार प्रसार में राष्ट्र सेविका समिति की सेविकाएं एकजुट होकर कार्य कर रही हैं।

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