ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव ने दुनिया भर में एलपीजी सप्लाई चेन को तोड़ दिया है। इसका सबसे दर्दनाक मंजर बिहार में देखने को मिल रहा है। दिल्ली, सूरत और अहमदाबाद जैसे शहरों से प्रवासी मज़दूर ‘पलायन‘ कर अपने घर लौट रहे हैं। वजह है—एलपीजी गैस की भारी किल्लत और ₹600 प्रति किलो तक पहुँची इसकी कीमत।
पटना व गया जंक्शन पर इन दिनों हर आने वाली ट्रेन के साथ सैकड़ों की संख्या में प्रवासी मज़दूर और छात्र उतर रहे हैं। ये वो लोग हैं जो रोज़ी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों में गए थे, लेकिन आज युद्ध की वैश्विक मार ने इन्हें बेबस कर दिया है। गया जिले के अलग-अलग प्रखंडों के रहने वाले इन कामगारों का कहना है कि शहरों में गैस मिल ही नहीं रही है। जहाँ मिल रही है, वहाँ कालाबाज़ारी चरम पर है। ₹500 से ₹600 प्रति किलो गैस खरीदना इन गरीब मज़दूरों के बस से बाहर हो गया है, जिसके कारण इनके सामने अब ‘भूखों मरने‘ की नौबत आ गई है।
सूरत से लौटे मजदूरों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि अब सूरत तभी जाएंगे जब गैस की किल्लत खत्म होगी। गैस की कमी की वजह से फैक्ट्रियों में अब एक ही शिफ्ट में काम हो रहा है, जिससे वेतन आधा हो गया है। ₹500 किलो गैस और कम वेतन के बीच खाने पर संकट आ गया था। वहीं दिल्ली में भी 1 किलो गैस के दाम ₹400 से ₹500 प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, जो एक आम मज़दूर की दैनिक कमाई से भी कहीं ज़्यादा है।
दरअसल, ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध के कारण ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य‘ (Strait of Hormuz) से होने वाली गैस और तेल की सप्लाई बाधित हुई है। अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है। वैश्विक बाज़ार में एलपीजी के दाम बढ़ने और सप्लाई रुकने का असर भारत के मेट्रो शहरों में सबसे पहले दिखा है। जब तक अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य नहीं होते, तब तक इन प्रवासियों के लिए वापस काम पर लौटना मुमकिन नहीं लग रहा है। फिलहाल, बिहार के ये प्रवासी कामगार अपने गांव में ही सुकून की तलाश कर रहे हैं।
कोरोना के बाद ये दूसरा बड़ा मौका है जब प्रवासियों को इस तरह मजबूरन घर लौटना पड़ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब जान पर खतरा था, और अब पेट पर। क्या सरकार इन लौटते प्रवासियों के लिए स्थानीय स्तर पर रोज़गार और एलपीजी की सस्ती दरों को सुनिश्चित कर पाएगी? ये एक बड़ा सवाल है।

