सुपौल: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों ‘समृद्धि यात्रा‘ पर हैं और जिलों को करोड़ों की सौगात दे रहे हैं। कल सुपौल में उन्होंने 569 करोड़ रुपये की 213 योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। लेकिन, इस पूरे कार्यक्रम में जिस बात ने सबसे ज्यादा सबका ध्यान खींचा, वो थी नीतीश कुमार की ‘खामोशी‘। नीतीश कुमार ने मंच से 2005 के पहले वाले बिहार की याद दिलाई, विकास का विजन बताया, लेकिन राज्यसभा चुनाव और दिल्ली जाने के अपने फैसले पर एक शब्द नहीं बोला।
सुपौल के निर्मली में नीतीश कुमार का अंदाज़ वही पुराना था। उन्होंने 569 करोड़ की योजनाओं के ज़रिए विकास का कार्ड खेला और जनता को याद दिलाया कि कैसे उनके शासन में बिहार में ‘जंगलराज‘ खत्म हुआ। उन्होंने कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द पर लंबी बात की। लेकिन हैरानी तब हुई जब पूरे भाषण के दौरान उन्होंने राज्यसभा चुनाव का जिक्र तक नहीं किया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज़ है कि आखिर नीतीश अब इस पर बात क्यों नहीं कर रहे? क्या कार्यकर्ताओं की नाराज़गी ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया है या फिर ये तूफान से पहले की शांति है?
राजनीतिक एक्सपर्ट इस खामोशी को एक सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं। उनके अनुसार, नीतीश कुमार अच्छी तरह जानते हैं कि बिहार की कमान अभी भी उन्हीं के हाथ में रहेगी, भले ही कुर्सी पर कोई और बैठे। 10 अप्रैल के बाद ही बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलेगा, तब तक नीतीश कुमार ‘वेट एंड वॉच‘ की स्थिति में हैं। जानकारों का कहना है कि नीतीश इस मुद्दे को सार्वजनिक मंच पर उछालकर कार्यकर्ताओं की नाराज़गी को और हवा नहीं देना चाहते। वे चाहते हैं कि सत्ता का हस्तांतरण इतनी शांति से हो कि विरोध की कोई गुंजाइश ही न रहे।
नीतीश कुमार के बारे में एक बात मशहूर है कि वे अंतिम समय में भी अपना फैसला बदल सकते हैं। हालांकि उन्होंने 5 मार्च को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है, लेकिन 16 मार्च को चुनाव होने के बाद भी वे 6 महीने तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं। ऐसे में राज्यसभा जाने की बात को पब्लिक डोमेन में न ले जाना, उनके लिए ‘स्पेस‘ बनाए रखने जैसा है। क्या नीतीश कुमार दिल्ली जाकर भी बिहार की ‘पैनी निगरानी‘ करेंगे? या फिर 10 अप्रैल को कोई ऐसा चेहरा सामने आएगा जिसकी कल्पना अभी किसी ने नहीं की है? नीतीश का यह ‘मौन‘ बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की आहट है।
नीतीश कुमार की राजनीति ‘अनप्रिडिक्टेबल‘ रही है। सुपौल की रैली में उनकी चुप्पी ने ये साफ कर दिया है कि वे अपनी अगली चाल का खुलासा समय आने पर ही करेंगे। 10 अप्रैल की तारीख बिहार के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। क्या ये नीतीश युग का अंत है या फिर एक नई शुरुआत, इस पर हमारी नज़र बनी रहेगी।

