बिहार की राजनीति और लालू परिवार के लिए अब संकट की घड़ी आ गई है। बहुचर्चित ‘लैंड फॉर जॉब’ यानी जमीन के बदले नौकरी देने के घोटाले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव की मुश्किलें अब और बढ़ गई हैं। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सीबीआई की चार्जशीट पर मुहर लगाते हुए लालू परिवार समेत 40 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दे दिया है। यानी अब इस घोटाले की नियमित सुनवाई शुरू होगी और लालू परिवार को ट्रायल का सामना करना पड़ेगा।
शुक्रवार को सीबीआई के विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव, राबड़ी देवी, तेज प्रताप यादव और मीसा भारती समेत 40 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। हालांकि, इस दौरान अदालत ने 52 अन्य आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी भी कर दिया। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब इस मामले में विधिवत सुनवाई और गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू होगी।
सीबीआई के मुताबिक, यह मामला 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। जांच एजेंसी का आरोप है कि रेलवे के विभिन्न जोनों में ग्रुप-डी की नौकरियों के बदले अभ्यर्थियों से औने-पौने दामों पर जमीन ली गई। ये जमीनें न केवल लालू यादव के परिवार के सदस्यों के नाम पर ट्रांसफर की गईं, बल्कि उनके करीबी सहयोगियों और शेल कंपनियों के जरिए भी इस ‘डील’ को अंजाम दिया गया। सीबीआई का दावा है कि रेलवे भर्ती के नियमों को ताक पर रखकर यह संगठित साजिश रची गई थी।
इस फैसले के बाद बिहार से दिल्ली तक राजनीतिक पारा चढ़ गया है। लालू यादव और बचाव पक्ष का शुरू से तर्क रहा है कि यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है और बीजेपी सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्षी गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। बचाव पक्ष का कहना है कि जमीन के सौदे पूरी तरह वैध थे। लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को फिलहाल खारिज करते हुए कहा कि मामले में गहन ट्रायल की आवश्यकता है।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुकदमा चलाने के लिए आधार पर्याप्त हैं। अब जब गवाहों की गवाही शुरू होगी, तब लालू परिवार की राजनीतिक और कानूनी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ सकती हैं।

