पटना में बुलडोजर बनाम रोज़ी-रोटी: विकास और बेबसी के बीच फंसा गरीब दुकानदार

पटना: बिहार में नई सरकार के गठन के बाद से जारी अतिक्रमण हटाओ अभियान अब राजधानी पटना में तनाव और बेबसी का माहौल पैदा कर रहा है। जहां प्रशासन इस कार्रवाई को शहर को व्यवस्थित करने की एक महत्वपूर्ण कवायद बता रहा है, वहीं फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले हजारों लोगों के लिए यह बुलडोजर सीधे उनकी रोज़ी-रोटी पर हमला बन गया है।

ताबड़तोड़ कार्रवाई से सब्ज़ी मंडी में अफरा-तफरी

पटना सिटी में आज दिन भर अफरा-तफरी का माहौल रहा। जिला प्रशासन और नगर निगम की संयुक्त टीम ने चौक थाना क्षेत्र की सब्ज़ी मंडी और अगमकुआं के मीट बाज़ार-मछली मार्केट को मुख्य रूप से निशाना बनाया। प्रशासनिक कार्रवाई इतनी ताबड़तोड़ थी कि कई दुकानदारों को अपना सामान समेटने का भी पूरा मौका नहीं मिला।

प्रशासनिक टीम का कहना था कि इन दुकानदारों को पहले ही चेतावनी दी जा चुकी थी, लेकिन निर्देशों का पालन नहीं किया गया। लिहाजा, टीम ने मौके पर ही बुलडोजर चलाकर सड़क किनारे लगी रेहड़ियों और खुली दुकानों को हटाना शुरू कर दिया। इस कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में तनाव और विरोध का माहौल देखने को मिला।

सड़कों पर फूटा गुस्सा और छलके आंसू

मीट बाज़ार और मछली मार्केट में कार्रवाई के दौरान कई दुकानदार फूट-फूटकर रो पड़े। उनकी बेबसी और गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई दिया।

एक पुरुष दुकानदार ने रोते हुए गुस्से में आरोप लगाया:

“सरकार हमारे रोज़गार को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के खत्म कर रही है। क्या हम जहर खाकर मर जाएं? बच्चों को क्या खिलाएं?”

दुकानदारों का कहना है कि वर्षों से यही उनकी एकमात्र आय का स्रोत है। अचानक दुकान तोड़ देने से उनके सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है।

वहीं, एक महिला दुकानदार ने रोते हुए सरकार से गुहार लगाई। उन्होंने कहा, “सरकार पहले हमें दुकान लगाने की सुरक्षित जगह दे। उसके बाद तुड़वाए।” उन्होंने चेतावनी दी कि अगर गरीबों की रोज़ी-रोटी ऐसे ही छीन ली जाएगी, तो मजबूरी में लोग गलत रास्तों पर चले जाएंगे।

विकास और बेबसी के बीच की दूरी

प्रशासन का तर्क है कि शहर को व्यवस्थित करने और यातायात को सुचारू बनाने के लिए यह अतिक्रमण हटाना जरूरी है। वहीं, दूसरी तरफ, ये छोटे दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले सरकारी योजनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव में बेबस हैं।

पटना में चल रहा यह बुलडोजर अभियान एक बार फिर विकास की सरकारी कोशिश और गरीबों की रोज़ी-रोटी के संकट के बीच की दूरी को साफ दिखा रहा है।

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