मोकामा, बिहार: बिहार की राजनीति में कहते हैं कि ‘प्राण जाए पर वचन न जाए‘, लेकिन क्या ये बात आज की सियासत पर फिट बैठती है? मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह आज एक अजीब से धर्मसंकट में फँस गए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का ऐलान कर दिया है और वे बिहार की सत्ता की कुर्सी छोड़कर दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं। लेकिन इस इस्तीफे के साथ ही सबकी नज़रें टिकी हैं अनंत सिंह के उस पुराने ‘ऐलान-ए-जंग‘ पर। बिहार चुनाव के दौरान ही अनंत सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जिस दिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे, उसी दिन वो अपनी विधायकी से इस्तीफा दे देंगे।
मोकामा के ‘छोटे सरकार‘ यानी अनंत सिंह अपनी वफादारी के लिए मशहूर हैं। कुछ समय पहले जब बिहार की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा शुरू हुई थी, तब अनंत सिंह ने बिना किसी लाग-लपेट के एक इंटरव्यू में अपनी अटूट श्रद्धा का इज़हार किया था। जब उनसे पूछा गया कि क्या वो नीतीश के बिना राजनीति करेंगे, तो उन्होंने दो-टूक कहा था— इस्तीफा दे देंगे। जब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे तब तक हम भी विधायक रहेंगे। वो नहीं रहेंगे, तो हम भी नहीं रहेंगे। उनका ये बयान तब तो सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हुआ, लेकिन अब यही बयान उनके राजनीतिक भविष्य के सामने एक बड़ा सवालिया निशान बनकर खड़ा हो गया है।
जैसे ही नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की खबर पर मुहर लगी, अनंत सिंह का अंदाज़ कुछ बदला-बदला और भावुक नज़र आया। इस्तीफे के सीधे सवाल पर अब अनंत सिंह बिहार के विकास की गाथा सुनाने लगे हैं। उन्होंने 2005 से अब तक के नीतीश कुमार के नेतृत्व को बिहार का ‘स्वर्णिम अध्याय‘ करार दिया। अनंत सिंह ने पुरानी यादों को कुरेदते हुए कहा कि जब बिहार पिछड़ेपन और बदहाली का पर्याय बन चुका था, तब नीतीश कुमार ने ही सुशासन और सामाजिक समरसता की नींव रखी। सड़कों का जाल बिछाने से लेकर महिलाओं के हाथ में ताकत देने तक—अनंत सिंह अब नीतीश कुमार के उन कामों की फेहरिस्त गिना रहे हैं, जिसने बिहार की तकदीर बदली।
अनंत सिंह के मुताबिक, नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना बिहार के लिए दुख नहीं बल्कि ‘गर्व का पल‘ है। उन्होंने दुआ की है कि बिहार की मिट्टी का यह सपूत अब देश की राजनीति को नई दिशा दे। लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या इस्तीफा होगा? सियासी गलियारों में सुगबुगाहट है कि अनंत सिंह अब अपनी वफादारी को तारीफों के पीछे छिपाकर अपनी कुर्सी बचा सकते हैं। वहीं विपक्षी खेमा उन पर तंज कस रहा है कि क्या ‘छोटे सरकार‘ अपनी बात के पक्के निकलेंगे या फिर राजनीति के ‘पलटी मार‘ खेल का हिस्सा बनेंगे? अनंत सिंह ने जिस तरह से नीतीश कुमार को विदाई दी है, उससे तो यही लगता है कि वो फिलहाल वफादारी के गुणगान में ही बिजी हैं।
नीतीश कुमार दिल्ली की उड़ान भर रहे हैं और बिहार की कमान नए हाथों में जाने वाली है। अनंत सिंह की दुआएं तो नीतीश के साथ हैं, लेकिन उनका वो पुराना वादा अब भी मोकामा की हवाओं में तैर रहा है। क्या अनंत सिंह वाकई अपनी विधायकी कुर्बान करेंगे या फिर ‘समय और परिस्थिति‘ का हवाला देकर राजनीति में बने रहेंगे? ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

