केरल में मलप्पुरम जिले के तिरुनावया में भरतपुझा नदी (इसे दक्षिण गंगा भी कहा जाता है) के तट पर कम से कम 250 साल बाद आयोजित 18 दिन चला महामाघम यानी मामंकम उत्सव गत तीन फरवरी को संपन्न हो गया। पिछले साल प्रयागराज में जनवरी-फरवरी में हुए महाकुंभ के दौरान ही दक्षिण भारत में इस कुंभ का आयोजन फिर से शुरू करने का संकल्प लिया गया था।
महाकुंभ में ही जूना अखाड़े के प्रमुख संन्यासी स्वामी आनंदवन भारती महाराज को दक्षिण भारत के लिए महामंडलेश्वर या अखाड़ा प्रमुख का दायित्व सौंपा गया था। दक्षिण भारत के इस 18 दिवसीय कुंभ को फिर से शुरू करने का विचार उनका ही था। उनकी देखरेख में ही मामंकम उत्सव आयोजित किया गया। ध्यान देने वाली बात यह है कि पढ़ाई के दिनों में स्वामी आनंदवन सीसीआई (एम) के छात्र संगठन से जुड़े रहे हैं।
मेले की सबसे बड़ी बात यह है कि आयोजन करीब ढाई सौ वर्षों बाद पुनर्जीवित किया गया है। बंद होने से पहले मामंकन उत्सव हर 12 साल में सनातन परंपरा के साथ बहुत धूमधाम से मनाया जाता था। इस दृष्टि से देखें, तो स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय संप्रभुता के मूर्त विचार अर्थात सामूहिक भारतीय गणतंत्र की भावना में व्याप्त परंपरागत सामाजिक-सांस्कृतिक औदार्य की स्वीकृति हर दिशा में एक समान ही थी।
पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण में निभाई जाने वाली सांस्कृतिक परंपराओं में पूरी तरह साम्य था। राजाओं के शासन के भू-भाग भले ही अलग-अलग थे, लेकिन हर राज्य के राजा और प्रजा सांस्कृतिक रूप से एक जैसी परंपराओं का ही निर्वाह करते थे। कुछ क्षेत्रीय परंपराओं का भी
प्रचलन रहा हो सकता है, किंतु मोटे तौर पर सनातन की पुष्ट और पूरी तरह से वैज्ञानिक परंपराओं का ही निर्वाह एक समान रूप से पूरे भारत में किया जाता था।
मुगलों और अंग्रेजों ने किए हिंदू व्यवस्थाओं पर प्रहार
अंग्रेज शासन आने के बाद से विभाजन की राजनीति पनपने पर जैसा वातावरण आज अनुभव होता है, वैसा पुराने समय में नहीं था। सिर्फ दक्षिण की ही बात करें, तो दक्षिण में आक्रांताओं पर हमले 1296 से 1311 तक अलाउद्दीन खिलजी ने शुरू किए। इसके बाद 1328-1342 तक दिल्ली की तुगलक सल्तनत और 1680 के बाद औरंगजेब ने दक्कन का युद्ध किया। इसके बाद 1766 से लेकर 1792 तक मैसूर के शासक हैदर अली और टीपू सुल्तान के मालाबार (केरल) पर अंकुश कायम किया। हैदर और टीपू ने अपने शासन की सीमाओं का विस्तार ही नहीं किया, बल्कि हिंदुओं की सामान्य समाज व्यवस्था, जैसे मंदिर अर्थव्यवस्था, अनुष्ठान केंद्रों और भूमि अनुदान प्रणालियों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।
इसके बाद अंग्रेज शासन आने के बाद बहुत कुछ सायास बदल दिया गया। अंग्रेजों ने मामंकन उत्सव के आयोजन पर रोक लगा दी। बहुत चतुराई से अंग्रेजों ने हिंदू जीवन मूल्यों, पद्धतियों, परंपराओं को सिर्फ धर्म के अनुपालन के तौर-तरीकों और कर्म-कांडों तक ही सीमित कर दिया। समाज और राज व्यवस्था को चलाने वाली शक्ति से उन्हें पूरी तरह वंचित कर दिया गया। लेकिन अब करीब ढाई सौ साल बाद केरल की पुरानी परंपरा पुनर्जीवित हुई है, तो हर भारतीय को इस पर गर्व होना चाहिए।
लेफ्ट को दिख रहा है सनातन का उभार?
दक्षिण के कुंभ के आयोजन की दूसरी बड़ी बात यह रही कि केरल सरकार ने थोड़ी बहुत ना-नुकुर के बाद आयोजन के प्रति लचीला रुख अपनाते हुए बड़े अड़ंगे नहीं डाले। व्यवस्थाएं बनाने में रुचि भी दिखाई। फिर ऐसा भी है कि जहां देश-विदेश के लाखों लोग (श्रद्धालु) जुटने हों, वहां व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी प्रशासन को करनी ही होगी। ऐसा करना प्रशासनिक विवशता भी है ही।
परंतु वस्तुस्थिति यह है कि केरल विधानसभा का कार्यकाल आगामी मई महीने में खत्म होने वाला है। उससे पहले वहां चुनाव होने हैं। ऐसे में केरल की वामपंथी सरकार ने मामंकम उत्सव के रूप में ऐतिहासिक पहल की राह में रोड़े क्यों नहीं बिछाए, यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। केरल में करीब 55 प्रतिशत मतदाता हिंदू हैं, बावजूद इसके वहां लेफ्ट और कांग्रेस का ही दबदबा रहता आया है। क्या महत्वपूर्ण प्रश्न का एक उत्तर यह हो सकता है कि लेफ्ट को भी अब सनातन के उभार का शिखर थोड़ा-बहुत ही सही, दिखाई देने लग पड़ा है?
लेफ्ट पार्टियां क्या अब मानने लगी हैं कि भारतीय राजनीति में बदलते समीकरणों के दौर में हिंदू परंपराओं का विरोध मात्र ही सेक्युलर सोच है, यह परिभाषा अब मान्यता खो चुकी है? क्या लेफ्ट को लग रहा है कि सत्ता प्राप्ति के मूल मंत्र मुस्लिम तुष्टीकरण से तंग आकर अब हिंदू भी एकजुट हो रहे हैं या केरल के संदर्भ में एकजुट होने की सोचने लगे हैं? लेफ्ट के मन में अगर लेशमात्र भी ऐसा विचार कौंधा है, तो चुनावी रणनीति बदलना उसकी सबसे बड़ी मजबूरी है।
भगवा ही लाल रंग की अंतिम परिणति
स्पष्ट है कि लाल रंग के कुटुंब में भगवा रंग ही ऊर्जा का सर्वाधिक प्रखर रूप है, कम से कम भारत भर में यह स्वीकार करने का सबसे सही समय आ गया है। एक और बड़ी बात दक्षिण के कुंभ में यह समझ में आई है कि युवा पीढ़ी अब भारतीय सनातन मूल्यों से फिर से जुड़ने लगी है। मामंकम उत्सव में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए।
जड़ों की ओर लौट रहे हैं भारतीय युवा
इससे पहले हम देख चुके हैं कि नए अंग्रेजी साल के अंतिम और पहले दिन बड़ी संख्या में युवा भारतीय श्रद्धा के विभिन्न केंद्रों मंदिरों, देवालयों और पवित्र स्थलों पर उमड़े थे। इससे भी पहले प्रयागराज महाकुंभ में युवा बहुत बड़ी संख्या में संगम में डुबकी लगाते दिखे थे। दक्षिण में कुंभ का एक और आयोजन होता है। तमिलनाडु के कुंभकोणम जिले में अलगा कुंभ यानी महामहम फरवरी-मार्च 2028 (तमिल माह मासी) में आयोजित होने की संभावना है। तब गुरु, सिंह राशि में प्रवेश करेंगे।
लेखक: रवि पाराशर


