
सन् 1975 मेरी आयु लगभग 7 वर्ष की रही होगी। सदैव की भांति सुबह उठने पर देखा माता जी , श्रीमती आशा शर्मा, किसी काम में व्यस्त हैं किंतु प्रतिदिन के ठीक विपरीत उनके चेहरे पर कुछ तनाव भी अनुभव किया। पिताजी , स्वर्गीय श्रीमान रमेश प्रकाश शर्मा,का घर पर ना होना हमारे लिए सामान्य सी बात थी। विद्यालय से घर आते समय अपनी गली में पहुंचते ही ,इस्त्री करने वाली की बेटी जो मेरी हमउम्र ही थी, जिसके साथ मैं पार्क में अक्सर इकट्ठे खेलती थी, कहने लगी कि तुम्हारे पिता जी को तो कल रात पुलिस पकड़ कर ले गई। यह बात सुनकर मुझे क्रोध आया तथा अपमानित भी अनुभव किया। घर आकर माताजी से पूछा तो वे बोली ऐसा कुछ नहीं है पिताजी तो करनाल गए हैं। पिताजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के रुप में दिल्ली प्रांत के सह-कार्यवाह का दायित्व संभाल रहे थे एवं एक स्कूल में अर्थशास्त्र के अध्यापक थे, जो कि आपातकाल में बंद कर दिया गया था।आपातकाल के दौरान पुलिस ढूंढ-ढूंढ कर संघ के स्वयंसेवकों को पकड़ रही थी, उन्हें जेल में डाल रही थी और उन पर कई तरह के अत्याचार कर रही थी। समाज के ऐसे लोग जो तत्कालीन कांग्रेस सरकार के इस लोकतंत्र विरोधी एवं अत्याचारी आपातकाल के विरुद्ध खड़े हो सकते थे इंदिरा गांधी की सरकार उन सभी की आवाज को कुचलने के लिए जेलों में बंद कर रही थी। यही कारण था कि पिताजी को भी बंदी बना लिया गया था। किंतु कुछ समय पश्चात ही , पूरी तरह उनकी जानकारी पुलिस को ना मिल पाने के कारण तथा जो मजिस्ट्रेट उनका केस देख रहा था उसके सुझाव के कारण, उन्हें बेल मिल गई। बाद में पता चला कि वह मजिस्ट्रेट विद्यार्थी परिषद का पूर्व कार्यकर्ता था।
इसके बाद हम सभी दिल्ली के शक्ति नगर एक्सटेंशन के एक घर में भूमिगत होकर रहने लगे। पिताजी और माननीय विश्वनाथ जी दोनों के नाम भी बदल दिए थे ताकि पुलिस उन तक ना पहुंच सके। पिताजी और संघ के वरिष्ठ प्रचारक माननीय विश्वनाथ जी इन दोनों को ही शुगर की बीमारी पता चली थी इसलिए उनका ठीक से भोजन इत्यादि समय पर हो सके तो माननीय विश्वनाथ जी भी हमारे साथ ही रहने लगे। उन वर्षों में माननीय विश्वनाथ जी और माननीय इंद्रेश जी जिनका घर में आना-जाना होता था , हम इन्हें ही अपने चाचा जी मानते थे क्योंकि अन्य कोई रिश्तेदार हमारे घर पर आ नहीं सकते थे। इन वर्षों में हम भी किसी रिश्तेदार से ना मिल पाए ना उनके घर जा पाए और ना वह हमारे घर आ पाए। उन दिनों गली में खेलने का बहुत प्रचलन रहता था लेकिन अपनी सारी मित्र मंडली के बीच से मैं और मेरी बहन अचानक गायब हो गए थे। माताजी और पिताजी को हमारे ढेरों प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते थे हम यहां क्यों रह रहे हैं? बुआ जी घर क्यों नहीं आ सकती ?मामा जी से कब मिलेंगे ?स्कूल क्यों बदल रहे हैं? हमारे घर में कोई सामान क्यों नहीं है? इत्यादि
विश्वनाथ जी के साथ बचपन के वो पल बहुत ही सुंदर थे। वे हमें बहुत अच्छी-अच्छी कहानी सुनाते थे, हमसे बातें करते थे और हमारी शैतानियों पर रोक भी लगाते थे। एक बार माताजी सुबह अपने स्कूल के लिए निकल गई और मैं और मेरी बहन तैयार होकर निकले किन्तु देरी के कारण हमारे स्कूल की बस छूट गई तो हम घर आ गए और हमने कहा कि बस निकल गई है इसलिए अब हम स्कूल नहीं जाएंगे तो विश्वनाथ जी ने कहा कि स्कूल की छुट्टी तो नहीं कर सकते और दंड स्वरूप वह हमें उस दिन पैदल स्कूल तक छोड़ कर आए और हमें छुट्टी नहीं करने दी। यह अनुशासन की सीख हमें उनसे मिली।
मेरी और मेरी छोटी बहन दोनों की पढ़ाई झंडेवालान स्थित सरस्वती शिशु मंदिर से चल रही थी जब आपातकाल लगा और आपातकाल में इन शिशु मंदिरों को भी बंद कर दिया गया जिस कारण हमें किसी अन्य विद्यालय में दाखिला लेना पड़ा। अचानक इस तरह अपने सभी मित्रों , सहपाठियों को छोड़ देना उनसे बिना बातचीत किए कहीं चले जाना बहुत अजीब था। विद्यालय की प्रधानाचार्य ने हमारे पिता जी से लिखवा लिया कि यदि ये दोनों बहनें अच्छे नंबर नहीं ला सकीं तो इन्हें पिछली कक्षा में कर दिया जाएगा । हमें बहुत ही अपमानजनक लगा और जैसे ही हमारी कक्षा का रिजल्ट आया और हमारे नंबर अच्छे आए हम पहुंच गए प्रिंसिपल के पास और उनसे कहा कि आप वह कागज वापस कीजिए जो आपने हमारे पिता जी से लिखवाया था।
माताजी दिल्ली सरकार के स्कूल में पढ़ाती थीं। पिताजी भी दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षक थे लेकिन वह अब अपने काम पर नहीं जा सकते थे तो वह घर पर ही रहते थे तो उसका असर यह हुआ कि जब मुझे अपने विद्यालय में अपने परिवार पर एक निबंध लिखने के लिए कहा गया तो मैंने लिखा कि माय मदर इज ए वर्किंग लेडी एंड माय फादर इज ए होममेकर। इस तरह की बहुत सारी घटनाएं उस समय घट रही थी फिर अचानक हमने अपना वह घर भी बदला और हमें किसी दूसरे घर गुजरांवाला टाउन जाकर के रहना पड़ा।
आपातकाल मेरे लिए एक अलग तरह का अनुभव था क्योंकि मैंने बहुत कुछ सीखा, मुझे माननीय विश्वनाथ जी जैसे महान व्यक्तित्व का समय मिल सका। हमारी माता जी विद्यालय में काम कर रही थी इसलिए हमारे परिवार को बहुत अधिक आर्थिक समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा किंतु ऐसे बहुत सारे परिवार थे जिनमें सिर्फ एक ही व्यक्ति की आय थी और वह जेल चले गए थे,उनसे जुड़ी संस्थाओं को बंद कर दिया गया था एवं उनके परिवार पर अत्याचार हो रहे थे । कांग्रेस की सरकार ने नर पिशाचों की भांति नसबंदी जैसा अत्याचार जनता पर किया। यह हमारे देश के लोकतंत्र के इतिहास का निश्चित रूप से काला अध्याय है जहां सिर्फ अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए, अन्यायपूर्ण शासन को बनाए रखने के लिए लोकतंत्र की गरिमा एवं न्यायालय के आदेश की अवहेलना करने में तत्कालीन श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने कोई समय व्यर्थ नहीं किया और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए सिर्फ अपनी सरकार को बचाने के लिए लाखों लोगों के जीवन को दुखों से भर दिया। कई लोगों की जेल में मृत्यु हुई , अनगिनत लोगों के साथ अन्य कई प्रकार के अन्याय हुए। दुर्भाग्य से यह सब तत्कालीन, जनता के द्वारा चुनी हुई, स्वतंत्र देश की सरकार कर रही थी।
भारत की भावी पीढ़ी को लोकतंत्र में जन सामान्य की भूमिका का महत्व ,लोकसंग्रह, लोकजागरण एवं लोकमत परिष्कार के महत्व को समझना है तो आपातकाल के इतिहास को अवश्य पढ़ना चाहिए

