72nd National Film Awards: अपनी बेबाक शायरी और अल्फाजों से लोगों के दिलों पर राज करने वाले दिवंगत शायर निदा फाजली आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी और उनकी जिंदगी की दास्तान आज भी अमर है।
और इस बात पर मुहर लगा दी है 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने, जहां निदा फाजली के जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘मैं निदा’ को ‘बेस्ट आर्ट्स एंड कल्चर फिल्म’ के पुरस्कार से नवाजा गया है। अहमदाबाद में आयोजित इस भव्य समारोह में जब यह नाम पुकारा गया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
अहमदाबाद में आयोजित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वितरण समारोह का माहौल उस वक्त बेहद गौरवशाली हो गया, जब ‘संप्रेषण मल्टीमीडिया’ के बैनर तले बनी फिल्म ‘मैं निदा’ के निर्माता अतुल गंगवार का नाम पुकारा गया।
देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों यह पुरस्कार प्राप्त करना ‘मैं निदा’ की पूरी टीम और देश भर के साहित्य प्रेमियों के लिए एक ऐतिहासिक और भावुक क्षण था। इस डॉक्यूमेंट्री ने न सिर्फ निदा फाजली साहब के व्यक्तित्व को पर्दे पर उतारा, बल्कि उनकी कला को एक नया मुकाम भी दिया है।
इस डॉक्यूमेंट्री के पीछे एक बेहद दिलचस्प और भावनात्मक कहानी है। इसके निर्माता अतुल गंगवार करीब ढाई दशक यानी 25 सालों तक निदा फाजली के बेहद करीब रहे। उन्होंने सिर्फ निदा साहब के साथ काम ही नहीं किया, बल्कि उनकी निजी जिंदगी, संघर्ष, रिश्तों और उनकी गहरी सोच को बहुत करीब से देखा और जिया है।
निर्माता अतुल गंगवार की निदा साहब से पहली मुलाकात साल 1998 में हुई थी। उस वक्त अतुल गंगवार ‘अदबी कॉकटेल’ नाम का एक शो बना रहे थे, और सबसे खास बात यह थी कि उस शो के लेखक खुद निदा फाजली साहब ही थे।
निदा फाजली साहब ने अपनी गजलों और नज्मों में जिस तरह आम आदमी के दर्द, तन्हाई और रिश्तों की सच्चाई को बयां किया, वैसा बहुत कम लोग कर पाए।
‘मैं निदा’ डॉक्यूमेंट्री केवल उनके जीवन का बायोग्राफिकल सफर नहीं है, बल्कि यह उस इंसान के भीतर झांकने का जरिया है जिसने बंटवारे के दर्द को झेला, मुंबई की गलियों में संघर्ष किया और फिर हिंदी-उर्दू अदब का एक ऐसा सूरज बना जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट आर्ट्स एंड कल्चर फिल्म’ का यह खिताब मिलना इस बात का सबूत है कि आज भी सच्ची कला और संजीदा कहानियों की उतनी ही कद्र है।
निर्माता अतुल गंगवार की मेहनत और निदा साहब की विरासत ने मिलकर इस डॉक्यूमेंट्री को एक मास्टरपीस बना दिया है, जिसे आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखेंगी।

