सत्य निकेतन हादसा- समाधान और भी हैं

दिल्ली के सत्य निकेतन में पुरानी जर्जर इमारत में विद्यार्थियों के लिए चलाए जा रहे गेस्ट हाउस(पी जी) में दुर्घटना घट गई, दुर्भाग्यवश सात जाने चली गई, अनेक घायल हुए। यह कोई पहली घटना नहीं है। इस प्रकार की घटनाएं पहले भी होती रही हैं। हां, भविष्य में पुनरावृति न ऐसी हो संभावनाओं पर सार्थक चिंतन किया जाना चाहिए। न कि कोर्ट कचहरी में बेतुकी याचिकाएं लगा न्यायालय का कार्य बढ़ाया जाए। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय अथवा न्यायालयों के पास इनका समाधान नहीं है। न सरकार ही इतनी बेइंतिहा बढ़ रही आबादी हेतु सभी सुविधाऐं उपलब्ध करा सकती है। भूमि तथा संसाधन सीमित हैं, आवश्यकताएं असीमित। तीन चार दशक पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग एक लाख विद्यार्थी पढ़ते थे तब भी होस्टल/छात्रावास की संख्या इतनी ही थी। गत चार दशकों में विद्यार्थियों की संख्या 6 गुणा बढ़ गई है। गत कुछ वर्षों में दिल्ली में अनेक नए शैक्षिक संस्थान प्रारंभ हुए, विभिन्न नए पाठ्यक्रम प्रारंभ हुए। CUET के कारण केंद्रीय विश्वविद्यालय का क्रेज बढ़ा। दिल्ली में सामान्य पाठ्यक्रमों हेतु भी दूरस्थ राज्यों से विद्यार्थी आने लगे। नए कॉलेज संस्थान तो बने हैं परंतु छात्रावास संख्या सीमित ही है। महाविद्यालयों में प्रतिवर्ष हजारों विद्यार्थी प्रवेश पाते हैं सभी के लिए छात्रावास उपलब्ध कराना किसी के लिए संभव ही नहीं है। इसलिए ऐसी याचिकाओं का कोई औचित्य ही नहीं। हां, समाज द्वारा अच्छी पहल से ऐसी समस्याओं का सहज समाधान उपलब्ध कर दुर्घटनाओं को कम किया जा सकता है। वास्तव में बदलते परिवेश में मानव की जीवन शैली, लोकाचार, लोक व्यवहार में परिवर्तन ने ही ऐसी समस्याओं के जन्म दिया हैं। आधुनिक विलासितापूर्ण सुविधा भोगी जीवन, परिवार परंपरा का ह्रास, लोभ लालसा, स्वार्थपरकता, पैसे से सब कुछ खरीदने की मानसिकता, आत्ममुग्धता, एकांकी जीवन, स्वयं को शिक्षित समझने का भ्रम पालने वाली युवा पीढ़ी में बढ़ता आलस्य प्रमाद तथा उच्छृंखलता ही अनेक समस्याओं की आविष्कारक है। माता पिता बच्चों को बालपन से संस्कार दें। परिवार परंपरा, मान मर्यादा, लोकाचार से परिचित कराएं, किशोरावस्था आते आते वे संस्कारों से सुदृढ़ हो, निखर जाएंगे। महानगरों में ऐसे अनेक परिवार हैं जिनके बच्चे अन्यत्र शहरों में पढ़ने चले गए या नौकरी, व्यवसाय हेतु के दूर स्थान पर हैं। वरिष्ठजन परिवारों में अकेले रह रहे हैं, कहीं तो मात्र पति पत्नी हैं। बड़े-बड़े मकान हैं। ऐसे भी अनेक एकांकी परिवार हैं कि जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं परंतु घर मकान पर्याप्त बड़े हैं, आय के पर्याप्त साधन नहीं, अतः उनके लिए उनका मेंटिनेंस भी समस्या है। इस प्रकार से सामाजिक वातावरण बने कि अभिभावक अपने बच्चों को ऐसे परिवारों में रखें। इससे उनकी कुछ आर्थिक सहायता भी होगी बच्चों को पारिवारिक वातावरण मिलेगा। परंतु इससे पूर्व बच्चों में संस्कार होने आवश्यक है। दोनों पीढ़ी में पर्याप्त व्यावहारिक, मानसिक अंतर हो जाता है। परिवार की मर्यादा, सामूहिक जीवन पद्धति, बड़ों का सम्मान करना, घर के कार्यों में सहयोग करना यह समझ भी आवश्यक है। 24 घंटे न बच्चे पढ़ सकते हैं, न सो सकते हैं, न खेल सकते हैं। इसलिए जिस परिवार में रहे वहां पेइंग गेस्ट के स्थान पर परिवार के सदस्य के रूप में रहें। कुछ समय मोबाइल से दूरी बना कर घर के छोटे-छोटे कार्यों में भी हाथ बटाएं। उनको पारिवारिक वातावरण मिलेगा। बुजुर्गों को बच्चों का सहारा मिलेगा, युवाओं को वरिष्ठजन का आत्मीय स्नेह, आशीर्वाद मिलेगा। यह समस्या बहुत आसानी से हल हो सकती है। कुछ दशक पूर्व यह समस्या नहीं थी। बड़े बड़े परिवार होते थे आय के साधन सीमित थे परंतु हृदय अति विशाल होते थे। विद्यार्थी शहर में पढ़ने हेतु आते तो किसी रिश्तेदार या गांव के परिचित के यहां ठहरते थे। वर्षों परिवार के सदस्य जैसे ही रहते थे। पुनः ऐसा वातावरण निर्मित किया जा सकता है परंतु पहल स्वयं से करनी होगी। संयुक्त परिवार की संकल्पना ही समाधान है। अनेक ऐसे संपन्न वरिष्ठजन भी हैं कि वे दो-चार विद्यार्थियों को तो निशुल्क भी अपने यहां रख सकते हैं परंतु समाचार पत्रों में अपराधिक घटनाओं को पढ़कर डर सहम जाते हैं। आजकल अनेक परिवारों में ही बुजुर्ग सुरक्षित तथा सुखी नहीं है फिर एक नई मुसीबत क्यों और मोल लें; इस झंझट से बचने के लिए वे एजेंसियों के माध्यम से परिचारिकाएं, सेवक रख लेते हैं। संस्कार इंस्टेंट कॉफी की तरह नहीं कि तुरंत तैयार हो जाए। यह वर्षों की साधना, सहज नित्य जीवन का अभ्यास होता है। जीवन में गुण बहुत धीरे-धीरे तथा अवगुण बहुत तीव्रता से प्रविष्ट होते हैं। गुणों की वृद्धि तथा अवगुणों का परिमार्जन दीर्घ काल के अभ्यास ही संभव हो सकता है। चरित्र निर्माण व्यक्तित्व का समग्र विकास अल्पकालिक विषय नहीं, समय लेता है। प्रयास प्रारंभ करें। ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो, इसलिए समस्याओं की नहीं समाधान की चर्चा करें।   लेखक:- संजय स्वामी

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