दिल्ली में पहली बारिश 8- 9 जुलाई में ही प्रशासन की व्यवस्थाएं धाराशाई हो गई। दो बच्चे भी जलभराव से बने जलाशय में डूब गए।
कुछ पत्रकार जिन्हें न प्रकृति- पर्यावरण की समझ है, न सामान्य ज्ञान, लगे हैं बारिश को कोसने! आखिर नाले उफान पर क्यों हैं ? उनका पानी सड़कों पर क्यों है? एक बारिश में ही गलियां, सड़कें नाले का रूप कैसे ले लेती हैं ?
सिस्टम बारिश से लाचार नहीं, अपितु भ्रष्टाचार के कारण स्थाई रूप से अपंग हो चुका है। कोई इंजीनियर किसी भी पद, स्तर का हो कभी नाले, नालियों, सड़कों के निर्माण कार्य को शायद ही देखने आते हों। अधिकांश नाले नालियां मात्र मरम्मत जैसी औपचारिकता से बनाए जाते हैं। उनमें निम्न स्तर का मैटेरियल प्रयुक्त किया जाना तो स्वाभाविक है परंतु निर्माण के समय उनके बहाव तथा लेवलिंग पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता। बड़े ठेकेदार छोटे ठेकेदार और मजदूरों को कार्य सौंप पार्टियों में व्यस्त रहते हैं। साइट पर काम करने वाले मजदूरों को चाय पिला नालों को दाएं बाएं मोड़ दिया जाता है।
दोषी हम भी कम नहीं। आखिर नाले नालियों में कचरा आता कहां से है? कुछ दुकानदार अपने शोरूम, दुकान में झाड़ू लगा कचरा बाहर की नाली-नाले में ही डालते हैं। कुछ समझदार कचरे में आग लगा वायु को सुगंधित बना, पानी की तेज धार से आगे बढ़ा देते हैं। जिम में पसीना बहाने वाली कुछ आधुनिक महिलाएं दूसरे, तीसरी मंजिल से ही पॉलिथीन में कचरा बांधकर गली में आने वाली नगर निगम की गाड़ी पर निशाना लगाती है। अनेक बार निशाना चूक जाता है और बेचारा कचरा किनारे की नाली में ही अपना अस्तित्व मान लेता है।
नालों में सारा कचरा घरेलू ही है फिर नाले दोषी या कुछ स्थानीय नागरिक व प्रशासन? हां कुछ भ्रष्ट, नगर निगम, नगरपालिका तथा पुलिस कर्मचारी सड़कों पर लगने वाले चाट खोमचे वालों से हफ्ता वसूली कर आंखे फेर लेते हैं। पौष्टिक आहार के माध्यम से स्वास्थ्य परोसते तथा शहर की सुंदरता में चार चांद लगाते, वे भी प्रतिदिन भरपूर कचरा किनारे के नालों में छोड़ते हैं। मध्य दिल्ली को पूर्वी दिल्ली से जोड़ने वाले यमुना के पुलों पर लगे ठेले, खोमचे, वेंडर किसी अधिकारी को नजर नहीं आते। सड़क जाम तो अलग, यमुना नदी में कचरा चुपचाप बहाया जा रहा है।
प्रकृति के संरक्षक, नदियों की निर्मलता तथा हरियाली के ब्रांड एंबेसडर बाबा भोले शंकर की भक्ति में कावड़ यात्रा प्रारंभ हो रही है। बाबा से प्रार्थना करते हैं कि अपने दोनों प्रकार के भक्तों- कावड़ियों को तथा भंडारा लगाने वाले श्रद्धालु जन को सुमति दें कि वे कम से कम अगले पंद्रह दिन अपनी सेवा तथा क्रियाकलापों से प्लास्टिक, पॉलीथिन, थर्मोकोल आदि का अजैविक कचरा (नॉन-बायोडिग्रेडेबल वेस्ट) न्यून करें।
लेखक: संजय स्वामी (चिंतक, स्तंभकार, पर्यावरण मित्र)


