मुंबई: क्या कला की कोई सीमा होती है? या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी समाज की अस्मिता से खिलवाड़ किया जा सकता है? भारत के छोटे-छोटे गांवों और शहरों में जहाँ ‘इज्ज़त‘ और ‘गौरव‘ महज़ शब्द नहीं, बल्कि जीने का आधार हैं, वहाँ एक फिल्म ने चिंगारी सुलगा दी है। फिल्म का नाम है— ‘यादव जी की लव स्टोरी‘। 27 फरवरी को रिलीज़ होने वाली यह फिल्म पर्दे पर आने से पहले ही विवादों के ‘रणक्षेत्र‘ में फंस गई है। एक तरफ़ रोमांस का दावा है, तो दूसरी तरफ़ जाति और धर्म के नाम पर सुलगता गुस्सा।
डायरेक्टर अंकित भड़ाना ने इसे एक रोमांटिक थ्रिलर का नाम दिया है। कहानी है ‘सिंपल यादव‘ की, जिसका किरदार मशहूर यूट्यूबर मृदुल तिवारी की बहन प्रगति तिवारी निभा रही हैं। कहानी के मुताबिक, सिंपल को ‘वसीम अख्तर‘ नाम के युवक से प्यार है। लेकिन समाज और परिवार की दीवारें बीच में खड़ी हैं। उसे मजबूर किया जाता है ‘अभिमन्यु यादव‘ से शादी करने के लिए। यहीं से शुरू होता है वो विवाद, जिसने उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा के यादव युवाओं को सड़कों पर उतार दिया है।
विवाद की आग में घी डालने का काम किया एक सोशल मीडियो पोस्ट ने। इस पोस्ट ने यादव समाज की तुलना ब्राह्मण समाज की एकजुटता से कर दी। पोस्ट पर लिखा गया— ब्राह्मणों ने एकजुट होकर नेटफ्लिक्स को घुटनों पर ला दिया और ‘घूसखोर पंडत’ का टाइटल बदलवाया, क्योंकी वह उनकी छवि खराब कर रहा था। लेकिन यादव समाज क्यों सो रहा है? एक मामूली यबट्यूबर हमारी बहन-बेटियों के चरित्र को परिभाषित कर रहा है और हम चुप हैं। इस एक पोस्ट ने यादव संगठनों को एकजुट होने का बहाना दे दिया। युवाओं का आरोप है कि फिल्म में यादव लड़की को ‘कमजोर‘ और ‘बहकने वाली‘ दिखाया गया है, जो सीधे तौर पर समाज का अपमान है।
विरोध सिर्फ नाम को लेकर नहीं है। फिल्म में हीरो का नाम ‘वसीम अख्तर‘ होने के कारण इसे ‘लव जिहाद‘ के प्रोपेगेंडा से जोड़ा जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का सवाल सीधा है— अगर कहानी प्यार की ही थी, तो टाइटल में ‘यादव जी‘ शब्द का इस्तेमाल क्यों? क्या यह जानबूझकर किसी खास समाज को टारगेट करने और ‘सस्ती लोकप्रियता‘ पाने का तरीका है? सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि क्या मेकर्स किसी और समाज के नाम के साथ ऐसा रिस्क ले सकते थे?
बढ़ते विरोध को देखते हुए लीड एक्ट्रेस प्रगति तिवारी ने इंस्टाग्राम पर सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि यह महज़ एक ‘काल्पनिक रोमांटिक ट्रायंगल‘ है और किसी समाज का अपमान करना उनका उद्देश्य नहीं है। फिल्म सेंसर बोर्ड से प्रमाणित है। प्रोड्यूसर संदीप तोमर का भी दावा है कि यह फिल्म समाज के दबाव और प्यार के बीच के संघर्ष को दिखाती है। लेकिन यह सफाई ‘आग में घी‘ साबित हुई। विरोधियों का कहना है कि सर्टिफिकेशन मिलने का मतलब यह नहीं कि आप भावनाओं को आहत करें।
27 फरवरी की तारीख जैसे-जैसे नज़दीक आ रही है, तनाव बढ़ता जा रहा है। यादव बाहुल्य इलाकों के सिनेमाघरों में विरोध प्रदर्शन की धमकियाँ दी जा रही हैं। सवाल कई हैं— क्या ब्राह्मण समाज जैसी एकजुटता दिखाकर यादव समाज इस फिल्म का टाइटल बदलवा पाएगा? क्या कोई लीगल पिटीशन इस फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगा पाएगी? या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी की जीत होगी और फिल्म बिना किसी बदलाव के पर्दे पर आएगी?

