मुंबई: अखबार के किसी कोने में छपी एक छोटी सी खबर— ‘सीवर की जहरीली गैस से सफाईकर्मी की मौत‘। हम अक्सर इसे पढ़कर पन्ना पलट देते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि उस सीवर में उतरने वाले इंसान का भी कोई परिवार है, उसका भी कोई सपना है, उसकी भी कोई प्रेम कहानी है? सांसद संजय सिंह की बेटी इशिता सिंह ने अपनी मेहनत की कमाई एक ऐसी फिल्म पर लगाई है, जो प्रॉफिट के लिए नहीं, बल्कि बदलाव के लिए बनी है।
इशिता सिंह ने केवल एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि एक कड़वी हकीकत को पर्दे पर उतारा है। अपनी रिसर्च टीम के साथ उन्होंने सीवर कर्मियों की जिंदगी को करीब से समझा। यह फिल्म उन बाबुओं और उस समाज को आईना दिखाती है जो सीवर कर्मियों की जान की कीमत कुछ भी नहीं समझते। इशिता ने इस गंभीर मुद्दे को एक बेहद सरल लेकिन दिल टूटने वाली प्रेम कहानी के साथ पिरोया है।
कहानी मुंबई की एक स्लम बस्ती की है, जहाँ मरियम उर्फ पारो (इशिता सिंह) अपने अब्बा के साथ सब्जी बेचती है। उसे पास की कॉलोनी में रहने वाले पिनाकी (संजय बिश्नोई) से प्यार हो जाता है। पिनाकी एक सीवर सफाईकर्मी है। पारो का यह सच्चा प्यार उसके अब्बा को मंजूर नहीं होता और वे अपनी ही बेटी को मानव तस्करी करने वाले एक गिरोह को बेच देते हैं। प्यार की तलाश में भटकता पिनाकी और मजबूरी में घुटती पारो— क्या ये दोनों कभी मिल पाएंगे? इसी सवाल का जवाब ढूंढती है यह फिल्म।
इशिता सिंह ने एक बातचीत में कहा था कि उनकी फिल्म सिर्फ लव स्टोरी नहीं, बल्कि उन लोगों की सच्चाई है जिनकी बात सिनेमा में कभी नहीं होती। बिना मेकअप के कैमरे के सामने आना और एक सब्जी बेचने वाली लड़की के संघर्ष को दिखाना इशिता की बहादुरी है। डायरेक्टर रुद्र जादौन की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने कहानी की डिमांड के अनुसार फिल्म को रियलिस्टिक रखा है। फिल्म में कुछ तकनीकी कमियां हो सकती हैं, लेकिन इसका मुद्दा इतना बड़ा है कि वे कमियां लापता सी हो जाती हैं।
फिल्म ‘पारो पिनाकी की कहानी‘ उन लोगों के लिए एक जरूरी फिल्म है जो सिनेमा में मनोरंजन के साथ-साथ समाज का सच देखना पसंद करते हैं। इशिता सिंह ने अपनी पहली कोशिश में ही ये साबित कर दिया है कि वे केवल एक राजनेता की बेटी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार कलाकार भी हैं। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि सीवर में उतरने वाला हर शख्स भी किसी का ‘पिनाकी‘ है और उसकी जान की भी कीमत है।

