स्वतंत्र प्रेस , न्यायपालिका, शक्तिशाली विधायिका, सजग आमजन और सभ्य समाज साथ मिलकर चलेंगे, तभी लोकतंत्र और देश मजबूत होगा-रवि शंकर प्रसाद

नईदिल्ली,11अक्टूबर424a4051-01

हमारी सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायिक सेवा आयोग बनाने का प्रयास किया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय उसके विरुद्ध आया। हमने उस निर्णय को स्वीकार किया। हम उसे स्वीकार करते हैं और न्यायपालिका का सम्मान करते हैं। लेकिन जिस तर्क के साथ सरकार के इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया गया उस पर मुझे गंभीर आपत्ति है। सर्वोच्च न्यायालय का तर्क यह था कि इस आयोग में कानून मंत्री शामिल होगा और ऐसी स्थिति में यदि सरकार के खिलाफ कोई मुकदमा आता है और उसकी सुनवाई हम करेंगे तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जाएगा। मैं आपके सोचने के लिए यह प्रश्न छोड़ना चाहता हूँ कि कानून मंत्री की नियुक्ति प्रधानमंत्री करता है। देश के सभी संवैधानिक पदों पर होने वाली नियुक्तियों में प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सभी मामलों में पूरा देश उस पर विश्वास करता है। क्या उससे यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वह एक ईमानदार, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायमूर्ति बनाए?

यह प्रश्न आज यहाँ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रेक्षागृह में केंद्रीय विधि एवं न्याय तथा संचार, इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने ‘हमारा संविधान : एक पुनरालवलोकन’ तथा ‘रीविजिटिंग ऑवर कॉन्स्टीट्यूशन’ पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए उठाया। वरिष्ठ पत्रकार श्री राम बहादुर राय एवं मंथन के संपादक डॉ. महेश चंद्र शर्मा द्वारा संपादित ये पुस्तकें वस्तुतः शोध त्रैमासिक ‘मंथन’ के हाल ही में आए भारतीय संविधान विशेषांक का पुस्तकाकार रूप हैं। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित इन पुस्तकों के लेखकों में स्वयं रविशंकर प्रसाद, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन, शांति निकेतन के कुलपति प्रो. बिद्युत चक्रवर्ती, चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विजय के. कायत, वरिष्ठ पत्रकार श्री जवाहर लाल कौल, संविधानविद श्री ब्रजकिशोर शर्मा, डॉ. चंद्रशेखर प्राण, डॉ. ओ.पी. शुक्ला, श्री डी.पी. त्रिपाठी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री एस. वाई. कुरैशी, राज्यसभा सदस्य डॉ. विनय सहस्रबुद्धे आदि शामिल हैं।

इस बात को बार-बार दोहराते हुए कि हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं और उनके आदेश को स्वीकार करते हैं, श्री प्रसाद ने कहा कि स्वतंत्र प्रेस , स्वतंत्र न्यायपालिका, शक्तिशाली विधायिका, सजग आमजन और सभ्य समाज ये सभी साथ मिलकर चलेंगे, तभी लोकतंत्र और देश मजबूत होगा। उन्होंने कोलेजियम व्यवस्था से पहले के कई आदर्श न्यायमूर्तियों के उदाहरण रखते हुए कहा कि कहीं न कहीं तो चूक हुई है और उसे ठीक किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति की हाल ही में प्रकाशित एक प्रति दिखाते हुए कहा कि मूल अधिकारों की शुरुआत प्रभु राम और सीताजी के चित्र के साथ होती है। आगे भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं। उसके आगे प्रभु हनुमान का भी चित्र है। यह सब प्रख्यात चित्रकार श्री नंदलाल बसु ने बनाए हैं, जिन्हें संविधान की मूल प्रति को सजाने का दायित्व सौंपा गया था। कल्पना करें कि यदि आज यह होता तो क्या-क्या प्रश्न उठाए जाते? ऐसा क्यों किया गया? क्योंकि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत है और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विचलित संविधान कभी स्थायी नहीं हो सकता। जो लोग उस राष्ट्रवाद को मानने की बात करते हैं जो संविधान में निहित है, उन्हें कम से कम एक बार संविधान ठीक से पढ़ लेना चाहिए। उन्होंने संविधान के बुनियादी ढांचे की भी बात की और कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए, न कि अलग-अलग न्यायाधीशों के निर्वचन पर निर्भर।

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कार्यक्रम का आरंभ वंदेमातरम से हुआ। आज ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं भारत रत्न नानाजी देशमुख का जन्मदिन है। इस क्रम में इनके चित्रों पर पुष्पांजलि भी अर्पित की गई। लोकार्पण के बाद चर्चा का आरंभ करते हुए मंथन के संपादक एवं एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश चंद्र शर्मा ने सभी लेखकों का परिचय दिया। उन्होंने संविधान सभा का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें शामिल एक भी ऐसा वक्ता नहीं है जिसने सभा के तात्कालिक स्वरूप पर असंतोष व्यक्त न किया हो। डॉ. अंबेडकर का स्पष्ट मत था कि हमारा देश एकात्म है, इसका संविधान भी एकात्म होना चाहिए। संघात्मकता इसे कमजोर करेगी। लेकिन किसी बात के विरोध के लिए विरोध का कोई अर्थ नहीं है। हमें इसे पढ़ना चाहिए, जानना और समझना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश त्यागी ने कहा कि संविधान सभा जिन परिस्थितियों में बनी, वह बुनियाद और प्रक्रिया सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं थी। हम अपने संविधान का सम्मान करते हैं, लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारे संविधान के कुछ प्रावधान अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो गए हैं। उदाहरण के लिए जब संविधान बना तब भूमंडलीकरण की जैसी आज अवधारणा है, ऐसी कोई अवधारणा नहीं थी। ऐसी कई बातों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमें इन विषयों पर समग्रता में विचार करना चाहिए और इनके समाधान के प्रयास करने चाहिए। अतिथियों का परिचय तथा अंत में धन्यवाद ज्ञापन कलानिधि के निदेशक एवं प्रमुख डॉ. रमेश चंद्र गौड़ ने किया।

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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कलानिधि विभाग तथा एकात्म मानवदर्शन एवं विकास प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस आयोजन में आज लोकार्पित इन पुस्तकों का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन ने किया है। ये पुस्तकें अभी तक आई संविधान विषयक पुस्तकों से इस अर्थ में सर्वथा भिन्न हैं कि इनमें भारतीय संविधान पर उसके अनुच्छेदों और तकनीकी विषयों से हटकर संविधान सभा में हुई बहसों और लोक में उसके प्रभाव की दृष्टि से विचार किए गए हैं। इसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. रघुवीर, डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद के वे ऐतिहासिक भाषण भी शामिल हैं जो उन्होंने संविधान सभा में विशिष्ट संदर्भों में दिए।