बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में कहां है राजद

अनीता चौधरी

विधानसभा चुनाव 2020 में एकजुटता और जनाधार के मोर्चे पर राजद की अग्नि परीक्षा

क्या तेजस्वी लगाएंगे चौका-छक्का या होंगे क्लीन बोल्ड

लालू के बेटे के रूप में तेजस्वी को बिहार में यादवों का अपार प्यार, मगर नेता मनाने को नहीं कोई तैयार

बिहार विधानसभा और विधान परिषद चुनाव से पहले राज्य की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को बड़ा झटका लगा है। राजद के पांच विधान पार्षदों ने पार्टी से नाता तोड़कर जदयू का दामन थाम लिया। तो, पार्टी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर नाराजगी दर्ज कराते हुए अल्टीमेटम दे दिया है। पांच विधान पार्षदों का पार्टी से अलग होना और रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेता का इस्तीफा देना तत्काल प्रतिक्रियावादी घटना नहीं है।

राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि इसकी पटकथा बहुत पहले से लिखी जा रही थी। लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में तेजस्वी प्रसाद यादव ने नेतृत्व संभाला, तो पार्टी के वरिष्ठ नेता असहज महसूस करने लगे थे। राजनीति के माहिर खिलाड़ी लालू की नजरों से पार्टी के सीनियर नेताओं की असहजता छुपी नहीं रह सकी। लिहाजा वे पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर वरिष्ठ नेताओं को सहज करने में सफल रहे। सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगा। महागठबंधन से जदयू के अलग होने के बाद तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष बने। धीरे-धीरे पार्टी ने उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और पार्टी की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया गया। तेजस्वी अपने पिता लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित होकर नेता तो बन गये, लेकिन लालू प्रसाद की तरह जननेता नहीं बन सके। पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं को लालू प्रसाद की कमी सालती रही। छोटे से बड़े कार्यकर्ताओं को लालू प्रसाद तक पहुंच की जो आदत पड़ी थी, वह तेजस्वी नहीं दे सके। चंद लोगों के बीच सिमट चुके तेजस्वी लोकसभा चुनाव में करारी हार के बावजूद नहीं संभले। चुनाव परिणाम के बाद वे लंबे समय तक पार्टी की गतिविधियों से तो आउट रहे ही, विधानसभा सत्र से भी अनुपस्थित रहे। नतीजा हुआ पार्टी के भीतर असमंजस की स्थिति बनने लगी। बतौर नेता प्रतिपक्ष के सफर की शुरुआत तेजस्वी ने जिस शैली और सक्रियता से की थी, इससे राजद के जनाधार में उम्मीद जगी थी कि वे लालू प्रसाद की कमी पूरी करेंगे। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद उनकी छवि चंद लोगों के बीच सिमटे ट्विटर राजनीतिज्ञ के रूप में बनने लगी। राजनीतिक गलियारे से लेकर आम से खास तक में यह चर्चा का विषय बन गया कि तेजस्वी से पहले उनके इर्द-गिर्द की कथित तिकड़ी मिलनेवालों को तय करती है। अब कहा जा रहा है कि नतीजा है लोगों से दूरी बनाते-बनाते तेजस्वी खुद ही अलग-थलग पड़ने लगे हैं। पार्टी के कार्यकर्ता हों या नेता तेजस्वी में लालू की छवि तलाशते रहे, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। रामचंद्र पूर्वे को हटाकर जगदानंद सिंह को अध्यक्ष बनाने के फैसले से भी पार्टी में सभी लोग सहमत नहीं दिखे। नये प्रदेश अध्यक्ष की कार्यशैली पर भी आवाजें मुखर होने लगीं। पार्टी में असहज महसूस कर रहे कार्यकर्ता से नेता तक में असुरक्षा की भावना पनपने लगी। नेता सुरक्षित भविष्य तलाशने लगे। परिणाम, पार्टी की टूट के रूप में सामने है। बिहार में 81 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं तेजस्वी यादव। पार्टी की कमान संभाल रखी है। आरजेडी की ओर से सीएम कैंडिडेट हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। माना जाता है कि नेता प्रतिपक्ष के पास उभरने का, सत्ता हासिल करने का बड़ा अवसर होता है। उसे राजनीतिक और सत्ता परिवर्तन का नायक और भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखा जाता है। चार महीनों बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होना है। उन्होंने लालू प्रसाद की विरासत तो संभाल ली, लेकिन जनाधार को समेटने में कामयाबी नहीं मिली। लोकसभा चुनाव परिणाम उदाहरण है। लालू प्रसाद के पुत्र के रूप में तो वे स्वीकार किये गये, जनसभाओं में भीड़ उमड़ती रही, लेकिन वह भीड़ जीत नहीं दिला सकी। तेजस्वी की छवि अभी खूंटा ठोक कर राजनीति करनेवाले और भदेसपन से लोगों में छा जानेवाले लालू प्रसाद की छवि से मेल नहीं खाती है। ऐसी स्थिति में राजद की कमान थामे तेजस्वी के सामने लालू प्रसाद के खड़ा किया गये जनाधार को समेट कर रखने और पार्टी को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती है। अग्निपरीक्षा है। और, इस अग्निपरीक्षा में पास होना तभी संभव है, जब तेजस्वी जन-नेता बनने की ओर कदम बढ़ाते दिखेंगे। कुछ के बीच से बाहर निकलकर आम का बनना होगा। नेता के अलावा कार्यकर्ताओं की भी पहुंच को कायम करना होगा। खास से आम के बीच सुलभ होना होगा। पार्टी में टूट का असर भले ही विधान परिषद चुनाव पर असर न पड़े, लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव के लिए यह बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है। क्योंकि, इस भगदड़ से जनाधार में भी हलचल को नहीं नकारा जा सकता। ‘बात निकली है तो दूर तलक जाएगी’। माना जा रहा है पार्टी में हुई ‘टूट’ असर डालेगी, ‘कम या ज्यादा’।