बिहार: एक झलक

जनसंख्या की दृष्टि से बिहार भारत का दूसरा बड़ा राज्य है और भौगोलिक दृष्टि से बारहवां बड़ा राज्य है। बिहार राज्य का यह नाम ‘विहारा’ से लिया गया है जिसका अर्थ होता है ‘मठ’ । बिहार, हिंदुओं, जैन और विशेषतः बौद्ध धर्म के लोगों के लिए धार्मिक केंद्र हुआ करता था। वह बोधगया ही था जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।भगवान महावीर, जो एक महान धर्म, जैन धर्म के प्रतिस्थापक थे, वे भी यहीं पैदा हुए थे और उन्हें निर्वाण भी यहीं प्राप्त हुआ था। बिहार राज्य, पश्चिम में उत्तर प्रदेश, उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल का उत्तरी भाग और दक्षिण में झारखंड की सीमाओं से लगा हुआ है।

बिहार और उसके आसपास के पर्यटनbihar-history

बिहार पर्यटन- झील, झरने और हॉट स्प्रिंग्स के रूप में प्राकृतिक सुंदरता के क्षेत्र प्रदान करता है। प्राचीनकाल के क्लासिक भारत में प्राचीन बिहार ताकत, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र था। बिहार की राजधानी पटना के पास नालंदा और विक्रमशिला शिक्षा के केंद्र थे, जो कि क्रमशः 5 वीं और 8 वीं शताब्दी में स्थापित किये गए थे, और उस समय के सबसे पुराने माने जाने वाले वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालयों में गिने जाते हैं।bihar-tourism
बिहार हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और इस्लाम जैसे विभिन्न धर्मों के सबसे पवित्र स्थान में से एक है। एक बौद्ध मंदिर और यूनेस्को का विश्व विरासत स्थल ‘महाबोधि मंदिर’, भी बिहार में स्थित है। 1980 के दशक में महात्मा गांधी सेतु पटना, पूरे विश्व में किसी नदी पर बनाया गया सबसे लंबा पुल माना जाता था।bihar-ganga
पटना और राजगीर शहर बिहार के दो ऐतिहासिक शहरों के रूप में जाने जाते हैं।
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बिहार का इतिहास और सांस्कृतिक विरासत

हिन्दू,जैन और मुख्यतः बौध धर्म के लिए बिहार एक बड़ा धार्मिक स्थल था। बोधगया में भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
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पास ही स्थित नालंदा 5 वीं ई. में विश्व का प्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय था, जबकि राजगीर बुद्ध और जैन पथप्रदर्शक महावीर, दोनों से जुड़ा हुआ था। यहाँ ऐसा माना जाता था कि एक और बड़े धर्म के, ‘जैन धर्म’ के प्रतिस्थापक भगवान ‘महावीर’ का जन्म यहीं हुआ और उन्हें निर्वाण भी यहीं प्राप्त हुआ था।
यदि कोइ व्यक्ति बौद्ध धर्म का अध्ययन करना चाहता है तो ‘बोधगया’ की यात्रा उसके लिए सबसे अच्छी साबित हो सकती है। सासाराम और विशेष रूप से नालंदा, सबसे आकर्षक पर्यटक स्थलों में से एक हैं जो सामान्य पर्यटकों को दूर से लुभाते हैं।
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बिहार कई वर्षों से संस्कृति और शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। गुप्ता साम्राज्य जो 240 ई. में मगध से उत्पन्न हुआ था, विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, वाणिज्य, धर्म और भारतीय दर्शन के क्षेत्र में, भारत के सुनहरे युग के रूप में जाना जाता है।
विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में शिक्षा के सबसे पुराने और सबसे अच्छे केंद्रों में से एक थे। कुछ लेखक मानते हैं कि 400 ई. और 1,000 ई. के बीच की अवधि में बौद्ध धर्म को बढ़ाने के लिए हिंदू धर्म ने बहुत सहारा दिया। ब्रम्हविहार के निर्माण के लिए हिन्दू राजाओं ने बौद्ध भिक्षुओं को बहुत से अनुदान दिए।

बंगाल से अलग होकर 1912 में बिहार, भारत का एक स्वतंत्र राज्य बना। 1936 में बिहार का विभाजन हुआ और इससे उड़ीसा को अलग कर उसे अलग राज्य बनाया गया।पुन: वर्ष 2000 में बिहार का विभाजन हुआ और झारखंड राज्य अस्तित्व में आया.बिहार की आबादी 10,40,99,452(2011 जनगणना) है जिसमें 5,42,78,157 पुरूष व 4,98,21,295 महिलाओं की संख्या है। बिहार में 38 जिले,101 अनुमंडल और 534 प्रखंड है.यहां से 40 लोकसभा व 16 राज्यसभा की सीटें हैं। बिहार विधानसभा में 243 और विधान परिषद में 75 सदस्य होते हैं।नदियों व जल की बहुलता वाले इस राज्य की मुख्य फसलें,चावल,गेहूं,मक्का,चना,गन्ना,जूट आदि है तो पायराइट,बॉक्साइट,टिन,अबरख आदि प्रमुख खनिज है।

बिहार की अर्थव्यवस्था

बिहार की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य में संलग्न है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खनन व विनिर्माण में में उल्लेखनीय उपलब्धि के बाबजूद बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में सबसे आखिर में है और राज्य की लगभग आधी आबादी प्रशासनिक तौर पर गरीबी रेखा के नीचे है। झारखंड के गठन के साथ ही इसकी मुसीबतें बढ़ीं हैं और बिहार को खनिज संपदा के विशाल भंडार से वंचित होना पड़ा। निम्नतम प्रति व्यक्ति आय व अत्यधिक सघन जनसंख्या वाले बिहार की अर्थव्यवस्था पिछड़ती जा रही है।

कृषि

बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। बिहार का कुल भौगोलिक क्षेत्र लगभग 93.60 लाख हेक्‍टेयर है जिसमें से केवल 56.03 लाख हेक्‍टेयर पर ही खेती होती है। राज्‍य में लगभग 79.46 लाख हेक्‍टेयर भूमि कृषि योग्‍य है। विभिन्‍न साधनों द्वारा कुल 43.86 लाख हेक्‍टेयर भूमि पर ही सिंचाई सुविधाएं उपलब्‍ध हैं जबकि लगभग 33.51 लाख हेक्‍टेयर भूमि की सिंचाई होती है। बिहार की प्रमुख खाद्य फ़सलें हैं- धान, गेहूँ, मक्‍का और दालें। मुख्‍य नकदी फ़सलें हैं- गन्ना, आलू, तंबाकू, तिलहन, प्‍याज, मिर्च, पटसन। लगभग 6,764.14 वर्ग कि. मी. क्षेत्र में वन फैले हैं जो राज्‍य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 7.1 प्रतिशत हैं।

उद्योग

राज्‍य के मुख्‍य उद्योग हैं –

मुजफ्फरपुर और मोकामा में ‘भारत वैगन लिमिटेड’ का रेलवे वैगन संयंत्र।
बरौनी में भारतीय तेल निगम का तेलशोधक कारख़ाना है।
बरौनी का एच.पी.सी.एल. और अमझोर का पाइराइट्स फॉस्‍फेट एंड कैमिकल्‍स लिमिटेड (पी.पी.सी.एल.) राज्‍य के उर्वरक संयंत्र हैं।
सीवान, भागलपुर, पंडौल, मोकामा और गया में पांच बड़ी सूत कताई मिलें हैं।
उत्तर व दक्षिण बिहार में 13 चीनी मिलें हैं, जो निजी क्षेत्र की हैं तथा 15 चीनी मिलें सार्वजनिक क्षेत्र की हैं जिनकी कुल पेराई क्षमता 45,00 टी.पी.ड़ी. है।
इसके अलावा गोपालगंज, पश्चिमी चंपारन, भागलपुर और रीगा (सीतामढ़ी ज़िला) में शराब बनाने के कारखाने हैं।
पश्चिमी चंपारन, मुजफ्फरपुर और बरौनी में चमड़ा प्रसंस्‍करण के उद्योग है।
कटिहार और समस्‍तीपुर में तीन बड़े पटसन के कारखाने हैं।
हाजीपुर में दवाएं बनाने का कारख़ाना, औरंगाबाद और पटना में खाद्य प्रसंस्‍करण और वनस्‍पति बनाने के कारखाने हैं।
इसके अलावा बंजारी में कल्‍याणपुर सीमेंट लिमिटेड नामक सीमेंट कारखाने का बिहार के औद्योगिक नक्‍शे में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है।

सिंचाई

बिहार में कुल सिंचाई क्षमता 28.63 लाख हेक्‍टेयर है। यह क्षमता बड़ी तथा मंझोली सिंचाई परियोजनाओं से जुटाई जाती है। यहाँ बड़ी और मध्‍यम सिंचाई परियोजनाओं का सृजन किया गया है और 48.97 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्रफल की सिंचाई प्रमुख सिंचाई योजनाओं के माध्‍यम से की जाती है।

परिवहन

बिहार की परिवहन व्यवस्था शुरू से ही नदियों से प्रभावित रही है। नौका द्वारा नदियों के किनारों पर परिवहन की व्यवस्था रहती है। राज्य की परिवहन व्यवस्था गंगा नदी पर विशेष रूप से निर्भर है। गंगा नदी के उत्तर तथा दक्षिणी मैदानी भागों में रेल तथा सड़कों द्वारा परिवहन की व्यवस्था बाढ़ आदि से प्रभावित होती है, इसलिए नदी के किनारों पर सुदृढ़ तटबंधों का निर्माण कराया गया है। बिहार से उत्तर भारत के अनेक राज्य सड़क मार्ग से जुड़े हैं। शेरशाह ने पेशावर तक सड़क मार्ग का निर्माण कराया था। यह मार्ग उस समय ‘सड़क-ए-आज़म’ कहलाता था, आजकल इस सड़क को ‘The Grand Trunk Road / ग्रैंड ट्रंक रोड / जी. टी. रोड’ के नाम से जाना जाता है। शेरशाह ने 1542 ई. में इसका निर्माण कराया था। यह सड़क पेशावर से कोलकाता तक जाती है। बिहार की परिवहन व्यवस्था में सड़क और रेलमार्ग बहुत महत्त्वपूर्ण है किंतु जल परिवहन का विकास सीमित ही हुआ है। बिहार में यातायात के मुख्यतः चार साधन हैं-

सड़क
पुराने समय से ही बिहार उत्तर भारत के अन्य भागों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। प्राचीन शासकों की प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था स्थल मार्गों पर ही आधारित थी। सम्राट अशोक ने वैभवशाली मगध को राजधानी बनाया था, और राजगौर और पाटलिपुत्र के बीच राज्य मार्ग का निर्माण कराया था। मध्यकाल में मुग़ल शासकों और शेरशाह सूरी ने सड़क का निर्माण किया था। 1947 ई. में बिहार में कुल सड़कों की लम्बाई 1315 किलोमीटर थी। आजकल सड़कों की लम्बाई 67116 किलोमीटर है। राष्ट्रीय मार्ग राज्य की प्राथमिक सड़क व्यवस्था है। इसके रखरखाव की व्यवस्था केन्द्रीय सरकार पर है। राज्य में 4717 किलोमीटर लम्बे सड़क मार्ग का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त 26092 कि.मी. लम्बी सड़कों को दो लेन का किया जा रहा है।

प्रान्तीय राजमार्ग, जो ज़िला मुख्यालयों और प्रदेश की राजधानी को जोड़ते हैं। बिहार के मैदानी भाग में सड़कें बरसात में पानी में डूब जाती हैं।
स्थानीय सड़कें, जो ज़िला मुख्यालय को कस्बों और गाँवों को आपस में जोड़ती हैं। ये कच्ची और पक्‍की दोनों तरह की होती हैं। यह ईंटों से बनीं हैं और वर्षा से इनमें टूट-फूट हो जाती है।
मार्च, 2008 तक बिहार में 45,721.059 किलोमीटर पक्‍की सड़कें थीं। इनमें 3,734.38 किलोमीटर राष्‍ट्रीय राजमार्ग, 3,766.029 किलोमीटर प्रांतीय राजमार्ग, 7,992.65 प्रमुख ज़िला सड़कें, 2,828 किलोमीटर अन्‍य ज़िला सड़कें तथा 27,400 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें शामिल थीं।
रेलवे
बिहार में रेल लाइनों का अच्‍छा जाल बिछा हुआ है। मोकामा में एकमात्र रेलवे पुल होने के कारण उत्तरी बिहार के लिए परिवहन व्‍यवस्‍था में थोड़ी परेशानी है। कुछ महत्‍वपूर्ण स्‍थानों को जोड़ने वाले रेलमार्गो, जैसे- मुजफ्फरपुर-समस्‍तीपुर-बरौनी-कटिहार और समस्‍तीपुर राज्‍य के मुख्‍य रेलवे जंक्‍शन हैं।
उड्डयन
राज्‍य में सभी बड़े ज़िलों में हवाई पट्टियों के अलावा पटना में अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डा है। परिवहन के द्वारा राज्य की आर्थिक प्रगति तथा विकास होता है। परिवहन की समुचित व्यवस्था से औद्योगीकरण, कृषि और सामाजिक जीवन का विकास होता है।

शिक्षा

यद्यपि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बिहार की शिक्षा दर लगभग तिगुनी होकर राज्य की जनसंख्या के क़रीब 48 प्रतिशत तक पहुंच गई है, फिर भी यह देश के अन्य राज्यों की शिक्षा दर की तुलना में काफ़ी नीचे है। महिला साक्षरता दर (33.57 प्रतिशत) की तुलना में पुरुष साक्षरता दर (60.32 प्रतिशत) लगभग दुगनी है। 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को शिक्षित करना राज्य का प्रधान लक्ष्य है। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूलों में दाख़िला लेने के योग्य हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम ही माध्यमिक स्तर तक पहुंच पाते हैं, क्योंकि इनकी आर्थिक आवश्यकताएं इन्हें काम करने के लिए बाध्य करती हैं। व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षण संस्थाएं सरकारी विभागों द्वारा सहायता प्राप्त हैं। बिहार के उच्च शिक्षण संस्थानों में पटना स्थित प्राचीन व महत्त्वपूर्ण पटना विश्वविद्यालय; मुज़फ़्फ़रपुर में बी. आर. ए. बिहार विश्वविद्यालय और भागलपुर स्थित ‘तिलका मांझी भालपुर विश्वविद्यालय’ शामिल हैं। बाद के दोनों शिक्षण संस्थान विभिन्न विषयों में स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम संचालित करते हैं और इनसे अनेक महाविद्यालय संबद्ध हैं। द पटना स्कूल ऑफ़ आर्ट्स ऐंड क्राफ़्ट्स में विशिष्ट विषयों के शिक्षा दी जाती है।

प्राचीन काल में बिहार शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। शिक्षा का प्रमुख केन्द्र नालन्दा विश्‍वविद्यालय , विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय, वर्जासन विश्‍वविद्यालय एवं ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय थे।
बिहार में शिक्षा मध्यकाल से प्रारम्भ हुई थी। इस समय अधिकांशत: मुस्लिम ही उच्च शिक्षा ग्रहण करते थे। शिक्षा का माध्यम फारसी था किंतु कहीं संस्कृत के भी शिक्षण संस्थान थे।
अजीमाबाद (पटना) बिहार में फारसी का सबसे बड़ा केन्द्र था। बिहार के प्रसिद्ध विद्वानों में क़ाज़ी ग़ुलाम मुज़फ्फर थे।
आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ 1835 ई. में लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा किया गया। शिक्षा का माध्यम संस्कृत-फारसी के साथ अंग्रेज़ी भी था लेकिन अंग्रेज़ी भाषा की सर्व प्रमुखता थी।
पूर्णिया के बिहार शरीफ़ तथा छपरा में एक अंग्रेज़ी शिक्षा केन्द्र की स्थापना की गई।
प्राचीन शिक्षा केन्द्र
प्राचीन काल से बिहार शिक्षा का प्रमुख केन्द्र रहा है। जो निम्न हैं-

नालन्दा विश्‍वविद्यालय

गुप्तकालीन सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 415-454 ई.पू. नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की थी।
नालन्दा विश्‍वविद्यालय में अध्ययन करने के लिए जावा, चीन, तिब्बत, श्रीलंका व कोरिया आदि के छात्र आते थे।
जब ह्वेनसांग भारत आया था उस समय नालन्दा विश्‍वविद्यालय में 8500 छात्र एवं 1510 अध्यापक थे। इसके प्रख्यात अध्यापकों शीलभद्र, धर्मपाल, चन्द्रपाल, गुणमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, दिकनाग, ज्ञानचन्द्र, नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग, धर्मकीर्ति आदि थे।
इस विश्‍वविद्यालय में पालि भाषा में शिक्षण कार्य होता था। 12वीं शती में बख़्तियार ख़िलजी के आक्रमण से यह विश्वविद्यालय नष्ट हो गया था।

विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय
पालवंशीय शासक ने 770-810 ई. में विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की स्थापना की थी।
विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ न्याय, तत्वज्ञान एवं व्याकरण की शिक्षा दी जाती थी।
विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय के विद्वानों में रक्षित विरोचन, ज्ञानभद्र, बुद्ध जेतरित, रत्‍नाकर, शान्तिज्ञान, श्रीमित्र, अभयंकर थे।
इस विश्वविद्यालय में तिब्बत के छात्रों की संख्या सर्वाधिक थी।

ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय

ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय
पाल वंश के प्रथम शासक गोपाल ने ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय की स्थापना की थी। यह विश्‍वविद्यालय बिहार शरीफ़ नगर के समीप है। यह विश्‍वविद्यालय तन्त्र विद्या का केन्द्र था। महारक्षित और शीलरक्षित नामक प्रसिद्ध विद्वान थे।

तिलक महाविद्यालय

मगध में शिक्षा का केन्द्र तिलक महाविद्यालय था। इसका उल्लेख चीनी यात्रियों (ह्वेनसांग एवं इत्सिंग) ने अपने यात्रा संस्मरणों में किया है।
हर्यक वंश के शासकों ने इस विद्यालय की स्थापना की थी। यह विद्यालय महायान सम्प्रदाय का केन्द्र था।इस केंद्र में प्रज्ञानभद्र नाम के विद्वान थे।
तिलक महाविद्यालय की पचान नालन्दा के पास के तिल्लास गांव के रूप में की गयी है।
फूलहारी शिक्षण संस्थान
फूलहारी शिक्षण संस्थान नालन्दा के पास था।
यहाँ बौद्ध आचार्यों और तिब्बती विद्वानों का निवास रहा है।

सांस्कृतिक जीवन

बिहार का सांस्कृतिक क्षेत्र भाषाई क्षेत्र के साथ क़रीबी सम्बन्ध दर्शाता है। मैथिली प्राचीन मिथिला (विदेह, वर्तमान तिरहुत) की भाषा है, जिसमें ब्राह्मणवादी जीवन व्यवस्था की प्रधानता है। मैथिली बिहार की एकमात्र बोली है, जिसकी अपनी लिपि (तिरहुत) और समृद्ध साहित्यिक इतिहास है। मैथिली के प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाकारों में विद्यापति अपने शृंगारिक व भक्ति गीतों के लिए विख्यात हैं।

बिहार के व्यंजन, मेले और त्यौहार

बिहार में व्यंजनों की विविधता बिहार पर्यटन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार का भोजन मुख्य रूप से शाकाहारी है क्योंकि पारंपरिक बिहारी समाज बौद्ध और हिन्दू धर्म के अहिंसा के मूल्यों से प्रभावित हैं वे अंडे, चिकन, मछली और अन्य पशु उत्पाद नहीं खाते। बिहार के लोग मुख्यरूप से शाकाहारी हैं। चिकन और मटन के साथ कई बिहारी मांसाहारी व्यंजन भी यहाँ आम हैं।
कुछ व्यंजन जिनके लिए बिहार प्रसिद्ध है- सत्तू पराठा, इसमें भूने हुए चने के आटे को पराठे के अन्दर भरा जाता है और चोखा मैश किए हुए आलू का मसालेदार व्यंजन है।
छठ, बिहार का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण त्यौहार है, यह वर्ष में दो बार मनाया जाता है: एक बार गर्मियों में, जिसे छठी का छठ कहा जाता है, और एक बार दीपावली के बाद के एक सप्ताह के आसपास, जिसे कार्तिक छठ कहा जाता है। छठ में सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। इसमें एक बार शाम को और एक बार पौ फटने पर (सूर्योदय के समय) बहती हुई नदी के किनारे या किसी भी बड़े जलाशय पर, दो बार पूजा की जाती है।
छठ के अलावा भारत के सभी प्रमुख त्योहार जैसे मकर संक्रांति, सरस्वती पूजा और होली पूरी भव्यता के साथ बिहार में मनाए जाते हैं। सोनीपुर पशु मेला एक महीने चलने वाला समारोह है जो दीवाली के लगभग आधा महीने के बाद शुरू होता है। यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। यह सोनीपुर की गंडक नदी के किनारे आयोजित किया जाता है।

साहित्य

भोजपुरी बोली में शायद ही कोई लिखित साहित्य है, लेकिन इसका मौखिक लोक साहित्य प्रचुर है। मगही का लोक साहित्य भी काफ़ी समृद्ध है। आधुनिक हिन्दी व उर्दू साहित्य में बिहार के मैदानी क्षेत्रों के रचनाकारों का भी उल्लेखनीय योगदान है।

आदिवासी संस्कृति

अधिकतर आदिवासी गाँवों में एक नृत्य मंच, ग्राम पुरोहित द्वारा इष्टदेव की पूजा के लिए एक पवित्र उपवन (सरना) व अविवाहितों के लिए एक शयनागार (धुमकुरिया) होता है। साप्ताहिक हाट जनजातीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आदिवासी त्योहारों में (जैसे सरहुल), वसंतोत्सव (सोहारी) और शीतोत्सव (मागे पर्व) उमंग व उल्लास के पर्व होते हैं। ईसाईयत, उद्योगीकरण, नए संचार सम्पर्कों, आदिवासी कल्याण कार्यक्रमों व सामुदायिक विकास योजनाओं के कारण मूल आदिवासी संस्कृति तेज़ी से बदल रही है।

प्राचीनकालीन विख्यात स्थल

राज्य के मैदान धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व के स्थानों से सम्बद्ध हैं। नालन्दा में प्राचीनकालीन विख्यात नालन्दा बौद्ध विश्वविद्यालय था। राजगीर और इसके समीप के प्राचीन व आधुनिक मन्दिरों व धर्मस्थलों की अनेक धर्मों के श्रद्धालुओं द्वारा यात्रा की जाती है। पावापुरी में ही जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर को महानिर्वाण (ज्ञानप्राप्ति या पुनर्जन्म के अंतहीन चक्र से मुक्ति) की प्राप्ति हुई थी। गया एक महत्त्वपूर्ण हिन्दू तीर्थस्थल है और इसके निकट बौद्ध धर्म का पवित्र स्थल बोधगया स्थित है, जहाँ बुद्ध को बोधित्व की प्राप्ति हुई थी। पटना के उत्तर में सोनपुर के समीप हरिहर क्षेत्र में प्रत्येक नवम्बर में भारत के प्राचीनतम व विशाल पशु मेलों में से एक का आयोजन होता है। बिहार के अनेक हिन्दू त्योहारों में होली और छठ (मुख्यतया स्त्रियों द्वारा सूर्य की आराधना) का स्थान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।

भाषा

बिहार की आधिकारिक भाषाएँ हिन्दी भाषा और उर्दू हैं, परन्तु अधिकांश लोग बोलचाल में बिहारी भाषा (मागधी, मैथिली, भोजपुरी और अंगिका) का प्रयोग करते हैं।